Business Management

टेलर के प्रबन्ध सिद्धान्तों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

वैज्ञानिक प्रबन्ध से आशय एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Scientific Management)

वैज्ञानिक प्रबन्ध दो शब्दों के संयोग से बना है-विज्ञान और प्रबन्ध विज्ञान शब्द के भी स्वयं दो खण्ड वि + ज्ञान हैं। ‘वि’ का अर्थ अधिक और ‘ज्ञान’ का अर्थ हमारी साधारण जानकारी से है। इस प्रकार विज्ञान का अर्थ ज्ञान की अभिवृद्धि से है जो कि नये उद्योगों द्वारा हमारे सामान्य ज्ञान में जुड़ जाती है। दूसरा शब्द है-‘प्रबन्ध’ जिसका अर्थ है, किसी भी कार्य को सुव्यवस्थित ढंग से चलाना । अतः हम वैज्ञानिक प्रबन्ध का अर्थ इस प्रकार से ले सकते हैं कि किसी भी कार्य की अभिवृद्धि ज्ञान की सहायता से, योजनाबद्ध रूप से किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सुव्यवस्थित रूप से चलाने को वैज्ञानिक प्रबन्ध कहते हैं।

एफ. डब्ल्यू. टेलर (F. W. Taylor) के अनुसार, “वैज्ञानिक प्रबन्ध यह जानने की कला है कि आप लोगों से यथार्थ में क्या कराना चाहते हैं तथा यह देखना चाहते हैं कि वे उसको सुन्दर से सुन्दर तथा सस्ते ढंग से करें।

पीटर एफ. ड्रकर (Peter F. Dricker) के अनुसार, “वैज्ञानिक प्रबन्ध का आशय कार्य का संगठित अध्ययन, कार्य का सरलतम अवयवों में विभाजन तथा मजदूरी द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले कार्य के प्रत्येक अवयव का क्रमबद्ध सुधार करना है।”

एच. एफ. पर्सन (H.F. Person) के अनुसार, ‘वैज्ञानिक प्रबन्ध से तात्पर्य ऐसे प्रबन्ध से है जो वैज्ञानिक अन्वेषण एवं विश्लेषण से निकले हुए सिद्धान्तों पर अवलम्बित हो।”

सारांश रूप में, “वैज्ञानिक प्रबन्ध, प्रबन्ध की उस पद्धति को कहते हैं, जिसमें नियोजन एवं नियन्त्रण का केन्द्रीकरण हो और श्रमिकों की कार्य-क्षमता को बढ़ाने तथा अधिकतम उत्पादन के हेतु विभिन्न क्रियाओं का निरीक्षण किया जाये और प्रयोग के उपरान्त उसमें आवश्यक परिवर्तन किये जायें।”

वैज्ञानिक प्रबन्ध की विशेषताएँ या लक्षण (Characteristics of Scientific Management)

वैज्ञानिक प्रबन्ध की प्रमुख विशेषताओं या लक्षणों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) वैज्ञानिक प्रबन्ध की निश्चित योजना के द्वारा विभिन्न कार्यों को निश्चित तरीकों द्वारा सम्पादित किया जाता है।

(2) वैज्ञानिक प्रबन्ध में विभिन्न घटनाओं के सम्बन्ध में विश्लेषण एवं प्रयोग किये जाते हैं।

(3) वैज्ञानिक प्रबन्ध में अच्छे मानवीय सम्बन्धों पर विशेष जोर दिया जाता है।

(4) वैज्ञानिक प्रबन्ध में साधनों के अधिकतम उपयोग हेतु आवश्यक प्रयास किये जाते हैं।

(5) वैज्ञानिक प्रबन्ध में वस्तु का आकार, रंग, किरम, भार आदि के लिए प्रमाप निश्चित किये जाते हैं।

(6) वैज्ञानिक प्रबन्ध में कर्मचारियों में कार्य का विभाजन उनकी योग्यतानुसार किया जाता है।

(7) वैज्ञानिक प्रबन्ध में संस्था के पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए समस्त शक्ति को जाता है। जुटाया

(8) वैज्ञानिक प्रबन्ध में व्यक्तिगत हित के स्थान पर सामूहिक हित को सर्वोपरि माना जाता है।

(9) वैज्ञानिक प्रबन्ध के फलस्वरुप कर्मचारियों की कार्यकुशलता में वृद्धि सम्भव होती है।

(10) वैज्ञानिक प्रबन्ध के द्वारा संस्था के प्रत्येक कार्य विवेकपूर्ण ढंग से सम्पन्न किये जाते हैं।

वैज्ञानिक प्रबन्ध के सिद्धान्त (Principles of Scientific Management)

वैज्ञानिक प्रबन्ध के मुख्य तत्वों या सिद्धान्तों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) कार्य का अनुमान -वैज्ञानिक प्रबन्ध का यह सिद्धान्त इस बात पर जोर देता है कि सामान्य परिस्थितियों में एक श्रमिक को कितना कार्य करना चाहिए, तथा तथ्य को प्रयोगों द्वारा ज्ञात करके निश्चित किया जाये। यह वैज्ञानिक प्रबन्ध का आधारभूत सिद्धान्त है। (2) प्रयोग- श्रमिकों की कार्यक्षमता बढ़ाने के सन्दर्भ में वैज्ञानिक प्रबन्ध में प्रयोगों का भी काफी महत्व है। प्रयोग के बिना वैज्ञानिक प्रबन्ध नहीं हो सकता। ये प्रयोग निम्न तीन दृष्टियों से किये जाते हैं

(i) समय अध्ययन-इस प्रयोग के आधार पर प्रत्येक क्रिया को करने का प्रमाणित समय निश्चित किया जाता है, जिस समय में एक कार्यक्षमता श्रमिक कार्य कर सकता है। इसमें समय के आधार पर मजदूरी दी जाती है। निर्धारित समय से कम समय में काम करने वाले को अधिक मजदूरी दी जाती है एवं ज्यादा समय में काम करने वाले को कम मजदूरी दी जाती है। इससे श्रमिक की काम टालने की प्रवृत्ति का अन्त हो जाता है।

(ii) गति अध्ययन-गति अध्ययन वास्तव में कार्य करने की ऐसी सर्वश्रेष्ठ विधि का पता लगाने की पद्धति है जिसमें श्रमिकों को कम से कम अपने शरीर को हिलाना डुलाना है। इसके अन्तर्गत श्रमिकों की गतिविधियों को देखा जाता है और इस बात का प्रयत्न किया जाता है कि उस कार्य को करने की गतिविधियों में कमी हो। इसके लिए यन्त्रों में सुधार, श्रमिकों को शिक्षा, फिल्म आदि का प्रबन्ध किया जाता है।

(iii) थकावट अध्ययन-इसके अन्तर्गत प्रत्येक क्रिया करने में कितनी थकावट होती है, इसका अध्ययन किया जाता है अर्थात् थकान अध्ययन द्वारा यह पता लगाया जाता है कि श्रमिक को थकान कब, क्यों और कैसे होती है तथा उसे कैसे सुधारा जा सकता है। थकान अध्ययन का यह लक्ष्य होता है कि प्रत्येक श्रमिक को उचित विश्राम मिले और उसकी थकान कम हो।

(3) कार्य योजना का निर्माण-वैज्ञानिक प्रबन्ध का मुख्य केन्द्र योजना विभाग है। प्रयोगों के आधार पर प्रत्येक कार्य के लिए विशेष योजना तैयार की जाये तथा उसके अनुसार श्रमिकों की आवश्यकता का ध्यान रखा जाये।

(4) श्रमिकों का चुनाव तथा प्रशिक्षण-श्रमिकों की नियुक्ति वैज्ञानिक ढंग से करके उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाये। शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति का चुनाव करके अच्छे उसे वेतन पर नियुक्त किया जाये। आकर्षक वेतन भी श्रमिक को उत्तम कार्य करने का प्रोत्साहन देता है।

(5) कर्मचारियों में कार्य का समुचित वितरण की नियुक्ति एवं शिक्षा के बाद विभिन्न क्रियाओं का श्रमिकों में उनकी शारीरिक, मानसिक एवं यान्त्रिक योग्यता के अनुसार वितरण होना चाहिए जिससे श्रमिक वह काम प्रसन्नतापूर्वक करे तथा उद्योग को भी अधिकाधिक कार्यक्षमता का लाभ हो।

(6) वस्तुओं का समुचित चुनाव एवं उपयोग-श्रमिकों की कार्य-क्षमता उनको दिये जाने वाले कच्चे माल पर निर्भर होती है। इसलिए कारखानों में प्रमापित (Standard) वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। इसके बाद उन वस्तुओं के उपयोग करने की पद्धति भी निश्चित की जाती है, जिससे उपयोग करते समय वस्तुओं का अपव्यय न हो। वस्तुओं के उपयोग सम्बन्धी नये-नये प्रयोग करते रहना चाहिए।

(7) नवीनतम एवं कार्यक्षम यन्त्र सामग्री-श्रमिक की कुशलता एवं कार्यक्षमता तभी अधिक हो सकती है जब उन्हें अच्छे से अच्छे औजार दिये जायें तथा नवीनतम यन्त्र सामग्री पर वे काम करें। अतः बड़ी सावधानी से यन्त्रों का चुनाव करना चाहिए और यन्त्रों की कार्यक्षमता बनाये रखने के लिए समय-समय पर उनकी मरम्मत करवानी चाहिए और आवश्यकतानुसार यन्त्र के पुर्जों को बदलते रहना चाहिए। यन्त्रों के उपयोग पर भी निरीक्षण रखा जाना चाहिए।

(8) कारखानों का स्वस्थ वातावरण-कारखानों का स्वास्थ्यप्रद एवं प्रसन्नतापूर्ण वातावरण श्रमिकों की थकान दूर करता है और कार्य में उनकी रुचि जाग्रत रखता है। इसके लिए कार्य करने के लिए पर्याप्त स्थान, आवश्यकतानुसार तापक्रम में परिवर्तन करने का आयोजन, जलपान, स्नानगृह, शिशुगृह आदि की सुविधाएँ होना आवश्यक है।

(9) प्रेरणात्मक मजदूरी पद्धति-श्रमिकों की कार्य क्षमता में वृद्धि करने के लिए यह आवश्यक है कि कारखानों में प्रेरणात्मक मजदूरी पद्धति अपनायी जाये अर्थात् पद्धति ऐसी हो जिसके अपनाने से श्रमिक अधिक कार्य करने के लिए लालायित रहे। इसके लिए विभेदात्मक मजदूरी पद्धति उपयुक्त है।

(10) प्रमापीकरण प्रमापीकरण वैज्ञानिक प्रबन्ध का मुख्य तत्व है। इसमें सम्पूर्ण कार्य का प्रमापीकरण कर दिया जाता है। अर्थात् किसी भी प्रबन्ध व्यवस्था को वैज्ञानिक बनाने के लिए उत्पादन प्रणाली, नियन्त्रण पद्धति, सामग्री, यन्त्रों उपकरणों आदि का प्रमापित होना आवश्यक होता है। प्रमापीकरण के फलस्वरूप कार्य में एकरूपता आती है और किस्म में सुधार होता है। इसी कारण वैज्ञानिक प्रबन्ध में प्रमापीकरण को आधारशिला कहा गया है।

(11) मानसिक क्रान्ति-मानसिक क्रान्ति से तात्पर्य यह है कि मिल मालिक अपना दकियानूसी व्यवहार छोड़कर श्रमिकों के साथ सद्भावनापूर्ण एवं मानवतापूर्ण व्यवहार कर उन्हें अधिकाधिक सुविधाएँ देने के लिए प्रयत्नशील हों, श्रमिक अपने मालिकों के प्रति अच्छा व्यवहार रखें और भ्रममूलक धारणाओं को छोड़ दें। श्रम तथा पूँजी को घनिष्ठ सम्पर्क में आना चाहिए जिससे दोनों को लाभ हो।

वैज्ञानिक प्रबन्ध के लाभ (Advantages of Scientific Management)

वैज्ञानिक प्रबन्ध केवल नियोक्ताओं के लिए ही नहीं वरन् श्रमिकों, उपभोक्ताओं एवं समाज के लिए लाभदायक है। वैज्ञानिक प्रबन्ध के लाभों या पक्ष में तर्कों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) उत्पादन व्यय में कमी वैज्ञानिक प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य अपव्यय को रोककर उत्पादन व्यय में कमी करना है। इससे कारखाने के व्यय में मितव्ययता आती है जो कि सफलता की कुंजी है।

(2) वस्तु की किस्म में सुधार-उचित निरीक्षण एवं प्रमापीकरण की व्यवस्था लागू होने से की किस्म में सुधार होता है।

(3) औद्योगिक शान्ति-श्रम एवं पूँजी में पारस्परिक मित्रतापूर्ण वातावरण तैयार करने में वैज्ञानिक प्रबन्ध का महत्वपूर्ण योगदान है। औद्योगिक शान्ति से उत्पादकों को कार्य निश्चित समय में सम्पन्न होने का आश्वासन रहता है।

(4) श्रम विभाजन को प्रोत्साहन-वैज्ञानिक प्रबन्ध में श्रम विभाजन को अपनाया जाता है जिसमें उद्योग को श्रम विभाजन से होने वाले लाभों की प्राप्ति होती है।

(5) कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि कार्यक्षमता बढ़ने के कारण कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि होती है। समय-समय पर श्रमिकों को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक प्रकार के प्रोत्साहन दिये जाते हैं, जिनमें वित्तीय प्रोत्साहन भी शामिल हैं, इससे कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि होती है।

(6) कर्मचारियों की कार्यकुशलता में वृद्धि-वैज्ञानिक प्रबन्ध के अन्तर्गत कर्मचारियों में कार्य का समुचित एवं रुचि के अनुसार वितरण किया जाता है, जिससे कर्मचारियों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

(7) समय की बचत वैज्ञानिक प्रबन्ध अपनाने से कार्य करने में समय की बचत होती है। वैज्ञानिक प्रबन्ध में वैज्ञानिक रीतियों से काम करने के कारण या श्रमिक कम समय में अधिक कार्य कर सकता है।

(8) उपभोक्ता को सस्ती वस्तुएँ उपलब्ध होना-मशीनों द्वारा उत्पादन करने से वस्तु की लागत कम आती है। फलस्वरूप उपभोक्ताओं को वैज्ञानिक प्रबन्ध के द्वारा उत्पादित वस्तुएँ सस्ते मूल्य पर उपलब्ध होती हैं और उनके धन की बचत होती है।

(9) सामाजिक स्तर में वृद्धि – वर्तमान समय में किसी देश का अस्तित्व उसके औद्योगिक विकास के आधार पर आँका जाता है। वैज्ञानिक प्रबन्ध को अपनाने से उत्पादन बढ़ता है, देश में आय बढ़ती है और इस प्रकार उद्योग एवं व्यवसाय का विकास होता है।

(10) रोजगार के साधनों में वृद्धि-वैज्ञानिक प्रबन्ध के प्रणेता श्री टेलर का कथन है कि वैज्ञानिक प्रबन्ध के परिणामस्वरूप उत्पादकता में वृद्धि होती है, नये-नये कारखाने खुलते हैं और देश में रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है।

वैज्ञानिक प्रबन्ध के दोष (Disadvantages of Scientific Management)

वैज्ञानिक प्रबन्ध में कुछ दोष भी बताये जाते हैं जिनके आधार पर उत्पादक व नियोक्ता वर्ग पूर्णतया सन्तुष्ट नहीं है और श्रमिक वर्ग खुलकर विरोध करता है। वैज्ञानिक प्रबन्ध के दोषों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(A) उत्पादक व नियोक्ताओं का असन्तोष उत्पादक व नियोक्ताओं की दृष्टि से वैज्ञानिक प्रबन्ध में निम्न दोष बताये जाते हैं

(1) अधिक खर्चीली पद्धति-वैज्ञानिक प्रबन्ध पद्धति अधिक खर्चीली है, क्योंकि इसको अपनाने से यन्त्रों में सुधार योजना विभाग की स्थापना एवं निरन्तर शोध आदि में अधिक पूँजी लगानी पड़ती है। अधिक खर्चे के कारण छोटे उद्योग तो इसे अपनाने का साहस ही नहीं कर सकते।

(2) कुशल कर्मचारियों को प्राप्त करना कठिन-वैज्ञानिक प्रबन्ध को लागू करने के लिए कुशल एवं प्रशिक्षित कर्मचारियों को होना आवश्यक है, परन्तु यथाशीघ्र इनका मिलना सरल नहीं होता। अकुशल कर्मचारियों के हाथों में वैज्ञानिक प्रबन्ध की प्रणाली एक खिलौना मात्र बनकर रह. जाती है।

(3) मन्दीकाल में भारस्वरूप- मन्दीकाल में वैज्ञानिक प्रबन्ध की व्यवस्था भारस्वरूप लगती है, क्योंकि उस समय इस पर किया जाने वाला व्यय या तो लाभ को कम करता है अथवा हानि को बढ़ाता है।

(4) पूर्ण प्रमापीकरण सम्भव नहीं-वैज्ञानिक प्रबन्ध की सफलता के लिए पूर्ण प्रमापीकरण अपेक्षित है, किन्तु श्रमिकों के योग्यता, मानसिक शक्ति भिन्न-भिन्न होने के कारण पूर्ण प्रमापीकरण सम्भव नहीं हो पाता है।

(5) परम्परावादी दृष्टिकोण को त्यागने में कठिनाई नियोक्ता परम्परावादी दृष्टिकोण रखते हैं जिसे वे आसानी से त्यागने को तैयार नहीं होते, अज्ञात एवं अनिश्चित लाभ की आशा में वे वर्तमान पद्धतियों को त्यागकर जोखिम नहीं उठाना चाहते। (B) श्रमिकों का विरोध

श्रमिकों द्वारा वैज्ञानिक प्रबन्ध के विरोध के कारण श्रमिक वर्ग भी वैज्ञानिक प्रबन्ध का विरोध करता है, उनके द्वारा किये गए विरोध के निम्नलिखित कारण हैं

(1) श्रमिकों की प्रेरणा का अन्त-वैज्ञानिक प्रबन्ध में श्रमिक निर्देशों के अनुसार ही कार्य करता है। अतः वह एक मशीन की भाँति बनकर रह जाता है। उसको व्यक्तिगत कुशलता एवं योग्यता को प्रदर्शित करने का कोई अवसर नहीं मिलता। इस प्रकार श्रमिकों में प्रेरणा का अन्त हो जाता है।

(2) बेकारी का भय-वैज्ञानिक प्रबन्ध में अधिकतर श्रम बचाने वाले यन्त्रों का प्रयोग होता है। साथ ही श्रमिकों की कार्यकुशलता बढ़ जाती है। अतः प्रारम्भ में अनेक श्रमिकों के अयोग्य कहकर बाहर निकाल दिया जाता है। इस प्रकार श्रमिकों में बेकारी का भय बना रहता है।

(3) श्रमिकों पर कार्यभार अधिक-वैज्ञानिक प्रबन्ध अपनाने वाले श्रमिकों पर कार्यभार बढ़ जाता है उनको अधिक परिश्रम करना पड़ता है जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

(4) श्रम संघों द्वारा विरोध – श्रम संघ वैज्ञानिक प्रबन्ध का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि इसके अन्तर्गत श्रमिकों में मजदूरी, कार्य तथा सम्मान में अन्तर करने से विभाजन पैदा कर दिया जाता है। अतः उनमें एकता की भावना दुर्लभ हो जाती है।

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