Business Management

मिण्ट्जबर्ग के अनुसार प्रबन्धकीय भूमिकाओं की श्रेणियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

प्रबन्धकीय भूमिकाओं से आशय (मिण्ट्जबर्ग) [Meaning of Managerial Roles (Mintzberg)]

वर्तमान समय में प्रबन्धक एक संस्था में विभिन्न भूमिकाएँ निभाता है; जैसे-उत्पादन प्रबन्धक की भूमिका, वित्तीय प्रबन्धक की भूमिका, विकास प्रबन्धक की भूमिका, वितरण प्रबन्धक की भूमिका, कार्यालय प्रबन्धक की भूमिका, सेविवर्गीय (कर्मचारी) प्रबन्धक की भूमिका, विपणन प्रबन्ध की भूमिका आदि। मैकगिल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैनरी मिण्ट्जबर्ग ने प्रबन्धकीय भूमिकाओं के सम्बन्ध में एक नये दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया है। इस नवीन दृष्टिकोण के अन्तर्गत प्रबन्धक वास्तव में अपने कार्यों का निष्पादन कैसे करते हैं ? इस बात का अवलोकन किया गया है। इन अवलोकनों के आधार पर प्रबन्धकों की भूमिका क्या है, इसका निष्कर्ष निकाला गया है। मिण्ट्जबर्ग (Mintzberg ) के अनुसार, प्रबन्धकीय भूमिकाओं से आशय किसी कृत्य (job) अथवा पद (Posi tion) से सम्बन्धित व्यवहारों से है। जैसा प्रबन्धक का कृत्य अथवा पद होता है, वह वैसी भी भूमिका निभाता है। उदाहरण के लिए; यदि प्रबन्धक उत्पादन प्रबन्धक के पद पर कार्यरत है तो वह उत्पादन से सम्बन्धित भूमिकाएँ निभाता है; जैसे-उत्पादन नियोजन, उत्पादन नियन्त्रण, कार्य-विश्लेषण, किस्म नियन्त्रण व निरीक्षण, सामग्री प्रबन्ध, समय अध्ययन, गति अध्ययन, थकान अध्ययन, प्रक्रिया विश्लेषण, उत्पादन अनुसन्धान एवं विकास आदि ।

प्रबन्धकीय भूमिकाओं की श्रेणियाँ (Categories of Managerial Roles)

मिण्ट्जबर्ग (Mintzberg ) ने प्रबन्धकीय भूमिकाओं को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है जिनका प्रदर्शन अग्र रेखाचित्र द्वारा किया गया है I. अन्तर्व्यक्तिगत भूमिकाएँ (Interpersonal Role)- मिण्ट्जबर्ग ने अन्तर- व्यक्तिगत भूमिकाओं को निम्न तीन भागों में विभाजित किया है (1) आकृति प्रमुख अथवा मुख्य व्यक्ति भूमिका प्रबन्धक आकृति प्रमुख अथवा मुख्य व्यक्ति की भूमिका उस समय निभाते हैं जबकि वे किसी समारोह अथवा लाक्षणिक अवसरों में उपस्थित होकर अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हैं। ऐसी भूमिकाओं में निम्नलिखित सम्मिलित हैं आगन्तुक का अभिवादन करना, कर्मचारियों से सम्बन्धित सामाजिक कार्यक्रमों में उपस्थित होना (जैसे-विवाह, नव-निर्मित मकान में प्रवेश, जन्मदिन, अन्त्येष्टि), कर्मचारियों के मध्य प्रशंसात्मक प्रमाण-पत्रों का वितरण, संस्था की ओर से प्रतिनिधित्व आदि।

(2) नेतृत्व भूमिका – प्रबन्धक अपने समूह का नेता होता है। अतएव उसे नेता की भूमिका का निष्पादन करना पड़ता है। नेता के पीछे उसके अनुयायियों का एक समूह होता है जो उसके आदेश एवं निर्देश के अनुरूप कार्य करता है। किसी भी उपक्रम की सफलता अपने नेता के गुणों पर निर्भर करती है। एक कुशल नेतृत्व किसी व्यावसायिक इकाई को पतन से प्रगति की ओर ले जा सकता है, जबकि एक अकुशल नेतृत्व एक सफल व्यावसायिक इकाई का पतन की अग्नि में झोंक सकता है। नेतृत्व भूमिका में- (i) प्रेरणा, (ii) मार्ग-प्रदर्शन, (iii) प्रतिनिधित्व, (iv) अभिप्रेरणा, (v) समन्वय, (vi) अनुशासन, (vii) प्रशिक्षण, (viii) विकास, (ix) आदेश, (x) निर्देश, (xi) पहल, (xii) पर्यवेक्षण आदि सम्मिलित हैं।

(3) सम्पर्क अधिकारी की भूमिका-प्रबन्धकों को जन-सम्पर्क स्थापित एवं बनाये रखना पड़ता है। उन्हें बाहरी विश्व में संगठन का प्रतिनिधित्व करना पड़ता है। संगठन की जन-छवि प्रबन्धक के व्यवहार एवं प्रकृति पर निर्भर करती है। वे संगठन तथा बाहरी लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने वाली कड़ी होते हैं। सम्पर्क अधिकारी की भूमिका में (i) बाहरी लोगों से सम्पर्क करना, (ii) दृष्टि, विचारों तथा सूचनाओं का आदान-प्रदान करना, (iii) बाहरी सभाओं तथा सामाजिक कार्यक्रमों में संगठन का प्रतिनिधित्व करना तथा (iv) बाहरी लोगों को संगठन तथा उपक्रम के बारे में समय-समय पर जानकारी देना आदि सम्मिलित हैं।

II. सूचनात्मक भूमिकाएँ (Informational Roles) – मिण्ट्जबर्ग (Mintzberg ) के अनुसार, प्रबन्धक की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सूचनाएँ प्राप्त करना और उनका सन्देशवाहन करना है। विवेकपूर्ण निर्णयों को लेने के लिए प्रबन्धकों को विभिन्न स्रोतों से आवश्यक सूचनाओं की आवश्यकता होती है। सामान्यतः इस कार्य का निष्पादन- (i) पत्रिकाओं को पढ़ने, (ii) दूसरों से विचारों तथा सम्मतियों का आपस में विनिमय करने, (iii) उपभोक्तओं की आवश्यकताओं सम्बन्धी विभिन्न मामलों पर सूचनाएँ प्राप्त करने एवं परामर्श देने, (iv) प्रतियोगिताओं की ताकत, पहल तथा व्यूह रचनाओं का ज्ञात करने, (v) बाजार की दशाओं का पता लगाने, तथा (vi) समाज की आकांक्षाओं एवं आवश्यकताओं आदि को ज्ञात करके किया जाता है। मिण्ट्जबर्ग ने सूचनात्मक भूमिकाओं का निम्न तीन भागों में विभाजित किया है

(1) मोनीटर की भूमिका- मोनीटर की भूमिका में प्रबन्धक संगठन के आन्तरिक एवं बाहरी पर्यावरण पर निगाह रखता है। पर्यावरण से आशय संगठन के निर्णयों को प्रभावित करने वाले आन्तरिक एवं बाहरी घटकों से है। प्रबन्ध इन घटकों से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्रित करता है एवं विश्लेषण करता है।

(2) विस्तारक की भूमिका-विस्तारक भूमिका के अन्तर्गत प्रबन्धक अपने अधीनस्थों को उन सूचनाओं से अवगत कराता है जो उनकी पहुँच के बाहर होती हैं। ये सूचनाएँ संगठन के आन्तरिक तथा बाहरी पर्यावरण से सम्बन्धित हो सकती हैं।

(3) अधिवक्ता की भूमिका-अधिवक्ता की भूमिका के अन्तर्गत प्रबन्धक संगठन के बाहर के लोगों के साथ संगठन के प्रतिनिधि के रूप में वार्ता करता है, जैसे-अंशधारियों को कम्पनी की वित्तीय स्थिति के बारे में आवश्यक जानकारी देना, उपभोक्ता को सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा करने का आश्वासन देना, प्रेस से संगठन के बारे में बातचीत करना, सरकार को नियमों के पालन करने के सम्बन्ध में आश्वासन देना आदि।

III. निर्णयात्मक भूमिका (Decisional Roles)- निर्णयात्मक भूमिका प्रबन्धक की अन्तिम किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका है। वह इस भूमिका के माध्यम से अपने सभी कार्यों का निष्पादन करता है। मिण्ट्जबर्ग ने प्रबन्ध की निर्णयात्मक भूमिका को निम्न चार समूहों में विभाजित किया है (1) उद्यमी भूमिका- यह प्रबन्धक की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि उद्यमी के पद पर वह अधिक समय तक कार्यरत नहीं रह सकता। उद्यमी से आशय जोखिम उठाने की क्षमता से है। प्रबन्धक को पग-पग पर जोखित उठानी पड़ती है। उद्यमी भूमिका के अन्तर्गत प्रबन्धक निम्न कार्य सम्पन्न करता है- (i) इकाई का सुधार करना तथा पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों के अनुरूप परिवर्तनों को नियोजित करना, (ii) नवाचारों को लागू करना।

(2) बाघा निपटाने की भूमिका-संगठन में प्रबन्धक को पग-पग पर बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इस भूमिका के अन्तर्गत प्रबन्धक ऐसी परिस्थितियों का सामना करता है। जोकि उसके नियन्त्रण के परे होती हैं, जैसे-हड़तालें, सामग्री की कमी, शिकायतें, परिवेदनाएँ आदि। उदाहरण के लिए; संस्था में हड़ताल होना आजकल एक आम बात है। प्रबन्धक अपनी बाधा निपटाने की भूमिका के अन्तर्गत हड़तालों का दृढ़तापूर्वक सामना करता है एवं अन्ततः हड़तालियों को समझौता करने के लिए बाध्य करता है।

(3) संसाधन आबंटन भूमिका- संस्था में उपलब्ध संसाधन प्रबन्धक के अधीन होते हैं। वह इन संसाधनों का संस्था में कार्यरत समूहों में आवश्यकता के अनुरूप आबंटन करता है। मिण्ट्जबर्ग ने प्रबन्धक को इस भूमिका में मानवीय, भौतिक तथा वित्तीय संसाधनों के वितरक के रूप में सम्मिलित किया है।

(4) वार्ताकार भूमिका-मिण्ट्जबर्ग के अनुसार, एक प्रबन्धक को आवश्यकता पड़ने पर वार्ताकार की भूमिका भी निभानी पड़ती है। इस भूमिका के अन्तर्गत वह आन्तरिक मतभेदों तथा प्रतिवादों का निपटारा करता है। इसके अतिरिक्त वह बाहरी पक्षकारों; जैसे-श्रम संघ, पूर्तिकर्ता, बैंकर्स, ठेकेदार आदि से संगठन के हित में वार्ता करता है।

यदि देखा जाये तो उपरोक्त भूमिकाएँ अन्तर्सम्बन्धित हैं। यही नहीं, भूमिकाएँ एवं कार्य भी लगभग समान ही हैं। अन्तर यदि है तो दृष्टिकोण का जहाँ एक ओर कार्यों के अन्तर्गत प्रबन्धक के 1 विभिन्न कार्यों का उल्लेख करते हैं, वहाँ दूसरी ओर प्रबन्धक की भूमिकाओं के अन्तर्गत हम इस बात का उल्लेख करते हैं कि वह अपने कार्यों का निष्पादन किस प्रकार करते हैं ?

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