Business Management

नियोजन की परिभाषा दीजिए। प्रबन्ध में इसके उद्देश्य एवं महत्व को स्पष्ट कीजिए।

सामान्य अर्थ में नियोजन से आशय है-भावी गतिविधियों के बारे में पहले से ही अनुमान लगाना भावी परिस्थितियाँ अनिश्चित होती हैं, अतः कब, क्या और कैसे करना है, इसका पहले से ही निर्धारण किया जाता है। नियोजन भविष्य तथा वर्तमान के बीच के अन्तराल को पाटने के लिए एक पुल का कार्य करता है।

नियोजन, प्रबन्ध का सबसे महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है। प्रबन्ध के क्षेत्र में नियोजन से हमारा आशय वैकल्पिक उद्देश्य, नीतियों, विधियों तथा कार्यक्रमों में से सर्वश्रेष्ठ का चुनाव करने से है। यदि किसी कार्य की पूर्व योजना बना ली जाये तो अनिश्चितता एवं असफलता की सम्भावना में कमी आती है। प्रत्येक संस्था में उत्पादन प्रारम्भ करने से पहले यह विचार करना पड़ता है कि आवश्यक कच्चा माल, श्रम आदि की मात्रा क्या है एवं वह कहीं से प्राप्त होगा ? नियोजन में विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के तरीकों पर भी विचार किया जाता है।

1. एम. ई. हर्ले (M. E. Hurley) के अनुसार, “क्या करना चाहिए, इसका पहले से ही तय किया जाना नियोजन है। इसमें विभिन्न वैकल्पिक उद्देश्यों, नीतियों, विधियों एवं कार्यक्रमों का चयन किया जाना निहित होता है।”

2. कूट्ज एवं ओडोनेल (Koontz and O’Donnell) के अनुसार, “नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रिया है, कार्य करने के मार्ग का सचेत निर्धारण है, निर्णयों को उद्देश्यों तथ्यों तथा पूर्व विचारित अनुमानों पर आधारित करना है।”

3. एलन (Allen) के अनुसार, “नियोजन भविष्य को पकड़ने के लिए बनाया गया पिंजरा है।”

4. सी. एल. जार्ज (C. L. George) के अनुसार, “नियोजन वर्तमान में भविष्य को प्रभावित करने वाले निर्णयों को लेने का एक विवेकपूर्ण, आर्थिक एवं सुव्यवस्थित माध्यम है।”

5. विलियम एच. न्यूमैन (William H. Newmann) के अनुसार, ‘सामान्यतः भविष्य में क्या करना है, इसे पहले से तय करना ही नियोजन है। इस दृष्टि से नियोजन में मानवीय आचरण के अत्यन्त व्यापक एवं विस्तृत रूप का समावेश है।”

नियोजन की विशेषताएँ (Characteristics of Planning)

नियोजन की परिभाषाओं का अध्ययन करने से इसकी निम्न विशेषताएँ स्पष्ट होती है

(1) नियोजन भविष्य से सम्बन्ध रखता है।

(2) नियोजन प्रबन्ध का प्राथमिक कार्य है।

(3) नियोजन एक निरन्तर जारी रहने वाली लोचपूर्ण क्रिया है।

(4) नियोजन द्वारा विभिन्न विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का चयन किया जाता है।

(5) नियोजन प्रबन्धकों की कुशलता का आधार है।

(6) नियोजन बदलती हुई परिस्थितियों से गहरा सम्बन्ध रखता है।

(7) नियोजन उपक्रम के उद्देश्यों की प्राप्ति में योगदान देता है।

(8) नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रिया है, इसके लिए व्यावहारिक ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है।

नियोजन का उद्देश्य (Objectives of Planning)

नियोजन के प्रमुख उद्देश्यों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) भावी गतिविधियों में निश्चितता लाना-नियोजन का प्रथम उद्देश्य यह भी होता है कि इसके माध्यम से संस्था की भावी गतिविधियों में निश्चितता लायी जाये।

(2) पूर्वानुमान लगाना-नियोजन का दूसरा उद्देश्य अनिश्चित भविष्य के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाना है। ग्राहकों की कार्य, उत्पादन प्रणालियों, सरकारी नियमों आदि में परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाया जाता है।

(3) विशिष्ट दिशा प्रदान करना-नियोजन का एक उद्देश्य संस्था के प्रत्येक स्तर पर की जाने वाली कार्यवाहियों में समन्वय लाना है।

(4) समन्वय स्थापित करना-संस्था के निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने तथा नीतियों को कार्यान्वित करने के लिए विभिन्न विभागों एवं विभिन्न कर्मचारियों के कार्यों में समन्वय स्थापित करना भी नियोजन का प्रमुख उद्देश्य होता है।

(5) प्रबन्ध में मितव्ययिता लाना-जब प्रबन्धक प्रत्येक कार्य की योजना बना लेते हैं तभी सभी प्रयत्न उसी दिशा में आगे बढ़ते हैं और इससे अपव्यय अपने आप कम हो जाता है। इस प्रकार विभिन्न क्रियाओं को कम-से-कम लागत पर निष्पादन करना भी नियोजन का मुख्य उद्देश्य होता है।

नियोजन की प्रकृति (Nature of Planning)

नियोजन की प्रकृति को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) नियोजन प्रबन्ध का आधारभूत कार्य है-प्रबन्ध कार्य नियोजन, संगठन, समन्वय, निर्देशन, अभिप्रेरण तथा नियन्त्रण है। नियोजन इन सब कार्यों का आधार तैयार करता है। अन्य कार्यों की सफलता या असफलता नियोजन पर ही निर्भर करती है। संगठन के अन्य सभी कार्य नियोजन के पश्चात् ही सम्पन्न किये जाते हैं।

(2) नियोजन सार्वभौमिक है-नियोजन की आवश्यकता केवल व्यावसायिक संगठनों में ही नाही होती, अपितु सभी प्रकार के संगठनों में होती है चाहे संगठन व्यावसायिक हो या सामाजिक, धार्मिक अथवा राजनैतिक, चाहे संगठन छोटा हो या बड़ा, सभी प्रकार के संगठनों में नियोजन की आवश्यकता होती है। इस प्रकार नियोजन एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है।

(3) नियोजन एक चयनात्मक कार्य है-नियोजन प्रबन्ध का एक महत्वपूर्ण कार्य होता है। नियोजन के अन्तर्गत कार्य करने के विभिन्न विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव किया जाता है। संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अनेक विकल्पों का निर्धारण किया जाता है तथा उन सभी का सापेक्षिक मूल्यांकन करके सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव किया जाता है।

(4) नियोजन से प्रबन्धकीय कुशलता बढ़ती है-नियोजन प्रबन्ध की कार्य-कुशलता में वृद्धि करता है। नियोजन द्वारा सामग्री, विधियों, मानवीय साधनों, मशीन व पूँजी के प्रयोग में मितव्ययिता लाने का प्रयास किया जाता है। नियोजन की सहायता से ही प्रबन्धक न्यूनतम प्रयासों से अधिकतम परिणामों की प्राप्ति करते हैं।

(5) नियोजन समन्वय में सहायक होता है-नियोजन की सफलता से उपक्रम के उच्च प्रबन्धक अपने अधीनस्थों की क्रियाओं में प्रभावशाली ढंग से समन्वय स्थापित करने में सक्षम होते हैं। योजना में प्रत्येक व्यक्ति के कार्य का पहले से ही निर्धारण कर लिया जाता है। अतः उच्च अधिकारियों को यह मालूम हो जाता है कि किस व्यक्ति को क्या कार्य करना है और उन व्यक्तियों से वही कार्य कराया जाता है।

नियोजन का क्षेत्र (Scope of Planning)

वर्तमान समय में नियोजन का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। नियोजन के क्षेत्र में निम्न क्रियाओं को शामिल किया जा सकता है

(1) उद्देश्य (Objectives)- उद्देश्य ही परिणाम होते हैं जिनकी प्राप्ति के लिए ही सम्बन्धित क्रियाएँ की जाती हैं। उपक्रम के उद्देश्य निर्धारित करना नियोजन का प्राथमिक चरण है क्योंकि बिना लक्ष्यों या उद्देश्यों को निर्धारित किये नियोजन अपूर्ण होता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि उद्देश्य निर्धारित करना नियोजन की आधारशिला है।

(2) पूर्वानुमान (Forecasting)- इसके द्वारा विभिन्न घटनाओं के बीच सुस्थापित सम्बन्धों का अध्ययन किया जा सकता है और पूर्वानुमान के सिद्धान्तों को अपनाकर भावी घटनाओं का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। पूर्वानुमान व्यावसायिक नियोजन का आधार है। यह भविष्य की जोखिमों को स्पष्ट करके उपक्रम को इनका सामना करने के लिए सतर्क और सावधान करता है।

(3) नीतियाँ (Policies) -नीतियाँ एक सामान्य वितरण अथवा भावी कार्य विधि के विषय में सामान्य सहमतियाँ होती है। यह निरन्तर चलने वाला निर्णय निर्देश है जो उच्च प्रबन्धकों द्वारा तय कर दिया जाता है। नीतियाँ बनाने से विभिन्न लाभ होते हैं, जैसे-निर्णय की सीमा का स्पष्ट हो जाना, कर्मचारियों का मार्गदर्शन, अधिकार अन्तर में सहायता आदि।

(4) कार्य विधियाँ (Procedures) -कार्य-विधियाँ नीतियों द्वारा निर्धारित मार्ग को पार करने की विधि होती है। प्रत्येक अनुक्रम में उसके उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये निश्चित नीतियाँ बनायी जाती है और उन्हें पूरा करने के लिये निश्चित कार्य विधियों की स्थापना की जाती है। संक्षेप में, हम यह कह सकते हैं कि नीतियों को क्रियान्वित करने के लिये उपक्रम में निश्चित कार्य विधियाँ बनायी जाती हैं। इन कार्य विधियों के माध्यम से क्रियाओं को करने का ढंग एवं उनका क्रम निश्चित किया जाता है। ये कार्यविधियों उपक्रम के उद्देश्यों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप बनायी जाती है।

(5) नियम (Rules)- नियोजन प्रक्रिया में योजना का निर्माण करते समय निश्चित नियम बनाये जाते हैं। इन नियमों के आधार पर योजनाओं को क्रियान्वित किया जाता है। कुण्ट्ज एवं ओ’ डोनेल के अनुसार, “नियम योजनायें है जो कि आवश्यक क्रिया का मार्ग बताते हैं तथा इनका चयन, अन्य योजनाओं की तरह विकल्पों में से होता है।” नियम नीतियों से भिन्न होते हैं, क्योंकि नीतियाँ सोच-समझ कर उपक्रम के लाभ के लिये बनायी जाती है जबकि नियम योजनाओं का ही सरल रूप होते हैं।

(6) बजट (Budget)–आधुनिक व्यावसायिक युग में प्रत्येक कार्य अनुमानों के आधार पर किया जाता है। बजट भी एक योजना है जिसमें अनुमानित परिणामों का वितरण अंकों में रहता है। ये बजट अनेक प्रकार के होते हैं, जैसे-रोकड़ बजट, क्रय बजट, विक्रय बजट, आय-व्यय बजट आदि ।

बजट के माध्यम से ही उपक्रम की क्रियाओं पर नियन्त्रण रखा जा सकता है। अतः बजट नियन्त्रण का एक भाग है। लेकिन बजट सदैव भविष्य के लिये ही बनाया जाता है, भूतकाल के लिये नहीं।

(7) कार्यक्रम (Programme)- नियोजन कार्य को सम्पन्न करने के लिये कार्यक्रम बनाया जाता है। कार्यक्रम किसी कार्य को करने की संक्षिप्त योजना होती है, जिसे निश्चित क्रम में उद्देश्यों के अनुरूप नीतियों एवं कार्य-विधियों के अनुसार तैयार किया जाता है। ये कार्यक्रम अल्पकालीन, दीर्घकालीन, विस्तृत, सीमित, सामान्य अथवा विशिष्ट हो सकते हैं।

(8) मोर्चाबन्दी (Strategies) – व्यावसायिक युग में प्रत्येक उपक्रम के लिये आन्तरिक एवं बाह्य मोर्चाबन्दी करनी पड़ती है। मोर्चाबन्दी एक व्यावहारिक योजना है जो कि व्यवसाय में प्रतिद्वन्द्वियों की योजनाओं को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है।

नियोजन की आवश्यकता एवं महत्व (Needs and Importance of Planning)

वर्तमान समय में प्रबन्ध में नियोजन की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। जिस प्रकार उद्देश्यहीन व्यक्ति के लिए जीवन में सफलता पाना असम्भव होता है, उसी प्रकार बिना नियोजन के व्यावसायिक सफलता भी प्रायः कठिन हो जाती है। बिना पूर्व योजना के व्यवसाय चलाना वैसा ही होगा जैसा कि बिना पतवार के नाव का खेना अथवा बिना अभीष्ट स्थान की जानकारी के वायुयान का आकाश में उड़ना। नियोजन के महत्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) पूर्वानुमान लगाने में सहायक- नियोजन का प्रमुख उद्देश्य पूर्वानुमान लगाना है, क्योंकि बगैर पूर्वानुमान लगाये नियोजन अधूरा है। कहने का तात्पर्य यह है कि नियोजन का उद्देश्य भावी पूर्वानुमानों के आधार पर ही वर्तमान की योजना बनाना है।

(2) भावी अनिश्चितता का सामना करना-व्यवसाय का भविष्य अनिश्चित होता है क्योंकि व्यावसायिक क्षेत्र में अनेक परिवर्तन आते हैं। एक योग्य व्यवसायी वर्तमान परिस्थितियों का अध्ययन एवं विश्लेषण करके भविष्य के बारे में योजना बनाता है। योजना निर्माण करते समय लक्ष्य निर्धारित किये जाते हैं तथा भावी अनिश्चितताओं का पहले से अनुमान लगा लिया जाता है।

(3) लागतों में कमी लाना-नियोजन द्वारा उपक्रम के लक्ष्यों को न्यूनतम लागत पर ही पूरा किया जाना सम्भव होता है। नियोजन में लक्ष्य प्राप्ति के लिए न्यूनतम लागत पर उद्देश्य प्राप्ति के लिए विभिन्न विकल्पों का निर्धारण करके सर्वोत्तम विकल्प लिया जाता है। इस प्रकार कम लागत पर ही कार्य को पूरा किया जाना सम्भव होता है।

(4) महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करना-नियोजन के माध्यम से संस्था के अन्दर तथा बाहरी व्यक्तियों को उनके लक्ष्यों एवं उन्हें प्राप्त करने के लिए जानकारी प्रदान की जाती है।

(5) प्रतिस्पर्धा कम करने में सहायक-नियोजित कार्यों से प्रतिस्पर्धा कम करने में सहायता मिलती है अर्थात् नियोजन के फलस्वरूप संस्था में एक स्वतन्त्र प्रतिस्पर्धा का वातावरण उत्पन्न होता है, जिससे स्वस्य मोर्चाबन्दी को प्रोत्साहन मिलता है।

(6) लक्ष्यों पर ध्यान केन्द्रित होना- प्रत्येक उपक्रम के कुछ आधारभूत लक्ष्य होते हैं जिनकी प्राप्ति के लिए नियोजन किया जाता है। नियोजन का प्रमुख उद्देश्य संस्था के प्रबन्धकों तथा कर्मचारियों का ध्यान लक्ष्यों की ओर केन्द्रित करना होता है। परिणामस्वरूप संस्था के सभी व्यक्तियो का ध्यान उस मुख्य लक्ष्य की ओर केन्द्रित हो जाता है और उनमें किसी प्रकार का संघर्ष उत्पन्न होने की सम्भावना नहीं रहती है।

(7) समन्यय में सहायक कूटज एवं ओ’डोनेल के अनुसार, “योजनाओं के चुने हुए मार्ग हैं सारे सामूहिक कार्यों को समन्वित करता है।” नियोजन द्वारा उपक्रम के सभी विभागों के उद्देश्यों की स्पष्ट व्याख्या कर दी जाती है तत्पश्चात् सभी विभाग समन्वित ढंग से कार्य करते हैं। (8) भविष्य के कार्य में निश्चितता लाना किसी कार्य की उपयुक्त योजना बनाने का प्रमुख उद्देश्य भविष्य में किये जाने वाले कार्यों को निश्चित बनाना है, ताकि व्यवसाय का संचालन ठीक प्रकार से होता रहे।

(9) नियन्त्रण में सहायक- प्रत्येक व्यावसायिक संस्था में लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बजट बनाये जाते हैं तथा व्यवस्थित कार्यक्रम बनाये जाते हैं। इसके पश्चात् बजट के अनुरूप ही कार्य किया जाता है। इन बजटों के आधार पर ही प्रबन्धक व्यावसायिक क्रियाओं पर नियन्त्रण रख पाते हैं।

(10) प्रबन्ध को दिशा प्रदान करना-नियोजन, उपक्रम के प्रबन्धकों को घोषित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक दिशा प्रदान करता है। नियोजन के माध्यम से प्रबन्धकों को यह जानकारी प्राप्त हो जाती है कि वास्तव में क्या काम है तथा किस विधि से कार्य करना है।

अच्छे नियोजन के तत्व या लक्षण (Elements of Good Planning)

नियोजन प्रक्रिया में निम्न तत्व निहित होते हैं (1) लक्ष्य या उद्देश्य निर्धारण प्रत्येक उपक्रम का एक प्रमुख उद्देश्य होता है जिसकी प्राप्ति के लिए प्रबन्ध सदैव प्रयत्नशील रहता है। नियोजन के अन्तर्गत इस उद्देश्य का निर्धारण किया जाता है तथा लक्ष्य प्राप्ति के लिए समस्त व्यापारिक क्रियाओं का आयोजन किया जाता है। उद्देश्य या लक्ष्य किसी भी उपक्रम के एक नहीं बल्कि अनेक होते हैं। किसी भी उपक्रम की अनेक व्यावसायिक आवश्यकताएँ होती हैं और उसी के अनुरूप उद्देश्यों को सन्तुलित करना पड़ता है।

(2) सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव-प्रबन्धकों के सामने विभिन्न वैकल्पिक नीतियाँ, लक्ष्य, कार्यवाहियाँ तथा कार्यक्रम होते हैं और उनको इनमें से सर्वोत्तम का चुनाव करना पड़ता है। सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव तभी किया जा सकता है जबकि सभी विकल्पों का गहन अध्ययन तथा विश्लेषण किया जाय। नियोजन सर्वोत्तम तभी होता है जबकि अनेक विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव किया जाय।

(3) नीतियाँ निर्धारित करना-उद्देश्य संस्था का लक्ष्य होता है जबकि नीतियाँ लक्ष्य प्राप्ति का साधन अर्थात् उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए नीतियाँ बनायी जाती हैं। नीतियों का निर्माण उच्चस्तरीय प्रबन्धकों द्वारा किया जाता है। नीति के अनुसार काम करने से निर्णयन में एकरूपता बनी रहती है, पक्षपात की आशंका नहीं रहती तथा क्रियाओं में क्रमबद्धता बनी रहती है।

(4) कार्य-विधियों का निर्धारण करना-नियोजन प्रक्रिया में कार्य-विधियों का विशेष महत्व होता है, चूंकि इनके आधार पर ही कार्य करने की निश्चित पद्धति तय की जाती है। कार्य विधि संस्था के लक्ष्य को प्राप्त करने के सर्वश्रेष्ठ समाधान की ओर संकेत करती है। नीति, लक्ष्य को प्राप्त करके सिद्धान्त निर्धारित करती है, जबकि ‘कार्य विधि’ उस लक्ष्य को प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ ढंग निर्धारित करती है। यदि कार्य-विधियाँ निश्चित न करें तो संस्था का संचालन ढंग से नहीं हो पायेगा, अकुशलता, अव्यवस्था तथा अनियमितता बढ़ेगी।

(5) लोच-एक श्रेष्ठ नियोजन में लोच का गुण होना भी बहुत आवश्यक है। योजना में परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन करने का गुण होना चाहिए। भावी परिस्थितियों में परिवर्तन होने पर हमें योजना में भी परिवर्तन करना पड़ता है। परिवर्तन न्यूनतम लागत पर बिना किसी असुविधा के साथ होना चाहिए।

(6) नियम-नियम कार्य को करने का मार्गदर्शन है, जिसके आधार पर कार्य किया जाता है। नियम एक प्रकार से योजनाओं के ही सबसे सरल रूप होते हैं। एक नियम के अनुसार एक निश्चित स्थिति में एक निश्चित क्रिया की जानी चाहिए नियम सामान्यतः स्थिर होते हैं तथा इनका प्रयोग समान्यतः प्रत्येक स्तर पर किया जाता है। अन्य शब्दों में, नियम से आशय उन बिन्दुओं से है जो स्पष्ट करते हैं कि विशिष्ट परिस्थितियों में बिना किसी विचलन के क्या न किया जाये। नियम नियोजन के आवश्यक तत्व हैं और इनके आधार पर ही कार्यविधियों का मार्गदर्शन किया जाता है।

नियम एवं कार्यविधियों एक-दूसरे के समानार्थक न होकर एक-दूसरे से भिन्न हैं। नियम, कार्यविधियों के पथ-प्रदर्शक का कार्य करते हैं, जबकि कार्यविधियों द्वारा क्रियाओं का क्रम निर्धारित किया जाता है। इसी प्रकार नीति एवं नियम में भी अन्तर है। नीतियों, विचारों का मार्गदर्शन करती है जबकि नियम, कार्यविधियों का मार्गदर्शन करते हैं।

(7) बजट बनाना-बजट भावी योजनाओं का पूर्वानुमान होता है, जिसमें अपेक्षित परिणाम गणनात्मक रूप में व्यक्त किये जाते हैं। व्यवसाय की भावी गतिविधियों का बुद्धिमत्तापूर्ण आंकिक अनुमान बजट कहलाता है। बजट मानवीय और भौतिक संसाधनों से सम्बन्धित होते हैं और इस

आधार पर बजट अनेक प्रकार के हो सकते हैं; जैसे-क्रय बजट, विक्रय बजट, श्रम बजट आदि। बजट को नियोजन एवं नियन्त्रण की महत्वपूर्ण युक्ति माना जाता है।

(8) मोर्चाबन्दी या व्यूह रचना-मोर्चाबन्दी एक ऐसी योजना है जो प्रतियोगियों की नीतियों से उत्पन्न विशेष परिस्थितियों का मुकाबला करके बनायी जाती है। जब दो अथवा अधिक संस्थाएँ समान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयास करती है तो प्रतिद्वन्द्वियों की योजनाओं को ध्यान में रखकर बनायी गयी योजना के सफल होने में सन्देह रहता है। अतः प्रतिद्वन्द्वियों की योजनाओं का सामना करने के लिए मोर्चाबन्दी करनी पड़ती है।

(9) कार्यक्रम तैयार करना कार्यक्रम एक ऐसी विशिष्ट योजना है जो किसी विशेष स्थिति का सामना करने के लिए बनायी जाती है। दूसरे शब्दों में, किसी कार्य को करने की संक्षिप्त योजना को कार्यक्रम कहते हैं। कार्यक्रम इस प्रकार तय किये जाते हैं कि वे निर्धारित नीतियों के अनुरूप तथा नियत कार्य विधियों के अनुसार क्रियान्वित हों। कार्यक्रम अल्पकालीन, दीर्घकालीन, व्यापक अथवा सीमित अनेक प्रकार के हो सकते हैं।

(10) प्रमाप निश्चित करना-व्यवसाय में अनेक प्रकार के प्रमाप निश्चित किये जाते हैं; जैसे- समय प्रमाप, किस्म प्रमाप आदि। इन प्रमापों में शुद्धता, स्थिरता व मापक योग्यता के गुण होने चाहिए।

नियोजन की सीमाएँ अथवा कठिनाइयाँ (Limitations or Problems of Planning)

नियोजन के निर्माण के अन्तर्गत अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती है, जिन्हें नियोजन की सीमाओं के नाम से भी जाना जाता है। इन कठिनाइयों या सीमाओं को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) खर्चीली पद्धति-नियोजन का कार्य एक खर्चीला कार्य है। इसमें समय, श्रम व धन अधिक खर्च होता है परिणामस्वरूप लागत व्यय बढ़ जाते हैं, जिसका भार संस्था के स्वामियों अथवा उपभोक्ताओं पर पड़ता है।

(2) भावी अनिश्चितता भावी परिस्थितियाँ अनिश्चित एवं परिवर्तनशील होती हैं। इसी कारण जब कभी भी कोई प्रबन्धक किसी व्यावसायिक नियोजन के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाता है तो उसे विभिन्न मान्यताओं को अपनाना पड़ता है।

(3) श्रेष्ठ विकल्प के चुनाव की समस्या परिस्थितियाँ परिवर्तनशील होती है। यह आवश्यक नही है कि आज जो कार्य हमें सर्वोत्तम प्रतीत होता है, वह कल भी सर्वोत्तम हो। इस प्रकार श्रेष्ठ विकल्प के चुनाव की समस्या नियोजन में महत्वपूर्ण है।

(4) पर्याप्त लोच का अभाव-नियोजन के कार्य में एक मुख्य कठिनाई पर्याप्त लोच का अभाव। होना है। इसके अभाव में प्रबन्ध उत्साहहीन हो जाते हैं और वे व्यावसायिक उपक्रम के कार्यों में पूर्ण दिलचस्पी नहीं ले पाते। इसका कारण यह है कि परिस्थितियों के अनुकूल नियोजन में आवश्यक संशोधन करना अनिवार्य हो जाता है, किन्तु वे चाहते हुए भी ऐसा नहीं कर पाते, क्योंकि पर्याप्त लोच के अभाव में नियोजन में किसी भी प्रकार का संशोधन किया जाना उसके वश की बात नहीं होती।

(5) विश्वासयुक्त सूचनाओं के उपलब्ध होने में कठिनाई नियोजन की सफलता तथ्यों एवं सूचनाओं पर निर्भर करती है। यदि विश्वासयुक्त तथ्य एवं सूचनाएँ उपलब्ध न हो तो नियोजन का महत्व ही जाता रहता है। ऐसे तव्यों एवं सूचनाओं का उपलब्ध होना एक कठिन कार्य है। यही नहीं, नियोजन की अवधि जितनी अधिक लम्बी होगी, यह कठिनाई उतना ही अधिक व्यापक रूप धारण करेगी।

(6) व्यक्तिगत रुचि की समाप्ति-नियोजन के अन्तर्गत सभी कार्यक्रमों को पहले से ही निश्चित कर दिया जाता है जिसके परिणामस्वरूप संस्था में कर्मचारियों की व्यक्तिगत रुचि एवं पहल शक्ति की भावना पर प्रतिबन्ध लग जाता है और वे मशीनों की तरह निश्चित कार्यक्रम के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य होते हैं।

नियोजन की सीमाओं पर विजय प्राप्त करने के लिए सुझाव (Suggestions to Win on Limitations of Planning)

नियोजन प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों इस बात को कदापि सिद्ध नहीं करती कि नियोजन अनावश्यक है। वास्तव में नियोजन प्रबन्ध का एक अचूक अस्त्र है जिसके द्वारा संस्था के निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने की आशा की जाती है। अतः एक कुशल प्रबन्धक को नियोजन की सीमाओं या कठिनाइयों को दूर करने हेतु निम्न सुझाव दिये जा सकते हैं

(1) उपक्रम की आवश्यकता के अनुरूप नियोजन की सफलता के लिए यह जरूरी है कि योजना संस्था की आवश्यकताओं, साधनों तथा परिस्थितियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनानी चाहिये।

(2) विश्वासयुक्त तथ्यों एवं सूचनाओं पर आधारित एक प्रभावी योजना बनाने से पूर्व उससे सम्बन्धित तथ्यों एवं सूचनाओं का सावधानीपूर्वक संग्रह किया जाना चाहिये।

(S) सरल योजना- एक प्रभावी योजना इस ढंग से तैयार करनी चाहिए जो सबको आसानी से समझ में आ जाये।

(4) प्राप्त होने वाले लाभों की स्पष्ट जानकारी-जो भी व्यक्ति योजना से सम्बन्ध रखते हों, उन्हें योजना से मिलने वाले लाभ स्पष्ट दिखने चाहिए योजना की सफलता के लिये यह बहुत जरूरी है।

(5) छोटी-छोटी योजनाएँ-नियोजन की सफलता के लिए यह भी जरूरी है कि किसी कार्य को अनेक प्रक्रियाओं में बाँट देना चाहिए और फिर उसकी अलग-अलग योजनाएं बनानी चाहिये।

(6) मोर्चाबन्दी-योजना के कार्यान्वयन में मोर्चाबन्दी का अवश्य ध्यान रखना चाहिये।

(7) लोचपूर्ण नियोजन लोचपूर्ण होना चाहिए ताकि बदलती परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक समायोजन किया जा सके। दूसरे शब्दों में, एक प्रभावी योजना इस ढंग से तैयार करनी चाहिए कि अगर परिस्थितियों में परिवर्तन हो जाये तो हम उसमें संशोधन कर सकें।

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