Business Management

“प्रबन्ध व्यक्तियों का विकास है न कि वस्तुओं का निर्देशन।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।

“प्रबन्ध व्यक्तियों का विकास है, न कि वस्तुओं का निर्देशन” (Management is the Development of People, Not Direction of Things)

प्रस्तुत कथन अमेरिकन प्रबन्ध संघ के पूर्व अध्यक्ष लारेन्स एप्पले (Lawrence Appley) द्वारा प्रस्तुत किया गया है। यह कथन प्रबन्ध व्यवस्था में भौतिक साधनों की तुलना में मानवीय संसाधनों को अधिक महत्व प्रदान करता है। इस कथन में यह भाव भी छिपा हुआ है कि यदि मानवीय संसाधनों का प्रबन्ध करना कोई प्रबन्धकीय कार्य नहीं बल्कि मानवीय संसाधनों का विकास ही प्रबन्ध का महत्वपूर्ण कार्य है। इस कथना की व्याख्या को निम्न दो भागों में विभक्त किया जा सकता है

(अ) प्रबन्ध वस्तुओं का निर्देशन नहीं है (Management is not Direction of (Things) – औद्योगिक विकास के प्रारम्भिक काल में प्रबन्धकीय क्रियाओं का स्वरूप पूर्णतः भिन्न था। प्रबन्धकों का दृष्टिकोण उत्पादकता प्रधान था। प्रबन्धकों का प्रमुख कार्य उत्पादन के साधनों, जैसे-भूमि, पूँजी, श्रम, यन्त्र, टेक्नालॉजी आदि का कुशलतम उपयोग करना था। प्रबन्धक वस्तुओं के नक्शे एवं डिजाइनें तैयार करने, तथ्यों, आँकड़ों व सामग्री का एकत्रीकरण करने तथा यन्त्रों व मशीनों की स्थापना करने पर अधिक ध्यान देते थे। श्रमिकों का उपयोग भी एक ‘वस्तु’ के ही रूप में किया जाता था। श्रमिक एक निर्जीव एवं भावनाहीन उत्पादन का एक साधन मात्र या एफ. डब्ल्यू टेलर व उनके साथियों ने प्रबन्ध को वैज्ञानिक एवं तार्किक दृष्टि से देखा था। उन्होंने भौतिक साधनों व क्रियाओं पर अत्यधिक बल दिया था। टेलर की प्रबन्ध व्यवस्था में श्रमिक को मूलतः एक ‘आर्थिक मनुष्य’ के रूप में देखा गया था जिसे वेतन एवं मौद्रिक लाभ प्रदान करके ही अधिक कार्य के लिए प्रेरित किया जा सकता था।

परम्परागत प्रबन्ध की विचारधारा वस्तु प्रधान थी। इसके अनुसार उत्पादन वृद्धि के प्रमुख साधन, समय एवं गति अध्ययन, बजट नियन्त्रण, लागत नियन्त्रण, पर्यवेक्षण, वस्तु डिजाइन, अभिन्यास आदि थे। भौतिक क्रियाओं एवं प्रक्रियाओं के आधार पर ही प्रबन्ध व्यवस्था संचालित की जाती थी। इस प्रबन्ध प्रणाली में श्रमिक के विकास एवं आवश्यकताओं की पूर्णतः उपेक्षा की जाती थी। किन्तु आधुनिक प्रबन्धक श्रमिक को मूल रूप से ‘मनुष्य’ के रूप में स्वीकार करते हैं। उनकी मान्यता है कि श्रमिक एक भावना-प्रधान प्राणी है, जिसमें विकास की अनन्त आकांक्षाएँ एवं सम्भावनाएँ छिपी होती है। उसे मात्र मौद्रिक लाभ के आधार पर कार्य के लिए प्रेरित नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार प्रबन्ध को केवल वस्तुओं के निर्देशन तक सीमित नहीं किया जा सकता है क्योंकि

1. वस्तुएँ सामग्री व यन्त्र उत्पादन के साध्य नहीं है, साधन मात्र है

2. वस्तुओं का संचालन यांत्रिकी के नियमों (Law of Mechanics) के अनुसार होता हैं, जिनमें विकास की क्षमता एवं सम्भावना शून्य होती है।

3. भौतिक संसाधनों का कुशल उपयोग व्यक्ति की योग्यता पर निर्भर करता है।

4. भौतिक संसाधनों की तुलना में मानवीय साधन अधिक महत्वपूर्ण है।

5. मानव अर्थ प्रेरित ही नहीं है, भावना प्रेरित भी है। 16. मानवीय विकास ही प्रबन्ध का प्रमुख एवं अन्तिम उद्देश्य है।

(ब) प्रबन्ध व्यक्तियों का विकास है (Management is the Development of People)- मानवीय सम्बन्धों की विचारधारा के विकास के साथ ही प्रबन्धकों ने भौतिक संसाधनों से अपना ध्यान हटाकर मानवीय संसाधनों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। एप्पले ने इसका समर्थन करते हुए कहा कि ‘प्रबन्ध व्यक्तियों का विकास है। वास्तव में वस्तुएँ नहीं वरन्, ‘मनुष्य’ ही प्रबन्ध की मुख्य विषयवस्तु है। प्रबन्धक व्यक्तियों का विका करके अर्थात् उनकी योग्यताओं, गुणों, क्षमताओं, आदि को विकसित करके ही संगठन का कुशल संचालन कर सकते हैं। योग्य, निपुण एवं निष्ठावान व्यक्तियों के माध्यम से ही संगठन के भौतिक संसाधनों का कुशलतम उपयोग किया जा सकता है। प्रबन्ध व्यक्तियों का विकास है, इस तथ्य की पुष्टि निम्न आधारों पर की जा सकती है

(i) मानवीय संसाधनों को ‘मानव’ के रूप में देखना- यह सत्य है कि श्रमिक उत्पादन का एक महत्वपूर्ण साधन है, किन्तु मानवीय संसाधनों को एक ‘मानव’ के रूप में भी देखा जाना चाहिये। प्रबन्धकों को श्रमिकों के व्यक्तित्व, आवश्यकताओं, भावनाओं आदि पर विचार करते हुए यह स्वीकार करना चाहिये कि श्रमिकों की क्रियाएँ मनुष्य के नाते, प्रेरणा, हिस्सेदारी संतुष्टि, पुरस्कार, नेतृत्व, पद, अधिकार, दायित्व भावना आदि से प्रभावित होती है। इनके अभाव में श्रमिकों के मनोबल व सृजनात्मक शक्ति में कमी जाती है।

(ii) विकास की असीमित संभावनाएँ- उत्पादन के भौतिक साधनों की कार्यक्षमता सीमित होती है, उनका उपयोग अथवा दुरुपयोग किया जा सकता है, किन्तु फिर भी उनसे प्राप्त परिणाम उनके निवेश से अधिक नहीं हो सकते। पीटर एफ. ड्रकर लिखते हैं कि व्यक्ति के पास उपलब्ध समस्त साधनों में ‘मानव’ ही एक मात्र ऐसा साधन है जो विकसित हो सकता है। उसके परिणाम उसके प्रयासो (Inputs) से सदैव अधिक हो सकते हैं। शिक्षण-प्रशिक्षण, पदोन्नति, प्रेरणाएँ, पुरस्कार, कार्य-विस्तार, कार्य वृद्धि, स्थानान्तरण आदि के द्वारा व्यक्तियों का विकास किया जा सकता है। प्रबन्ध को व्यक्तियों की सृजनात्मकता, कल्पनाशक्ति एवं बौद्धिक क्षमताओं का अधिकतम उपयोग करना चाहिये।

(iii) ‘व्यक्ति’ ही प्रबन्ध का केन्द्र बिन्दु है-‘श्रम’ उत्पादन का घटक होते हुए भी उत्पादक का लक्ष्य है। वस्तुतः व्यक्ति ही समस्त वस्तुओं का उत्पादनकर्ता है और वही उनका उपयोगकर्ता है। समाज के समस्त साधनों का उपयोग व्यक्ति के कल्याण एवं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाता है। इसलिए प्रबन्ध को संसाधनों का उपयोग करते समय ‘व्यक्ति’ को केन्द्रीय तत्व मानना चाहिये।”

(iv) मानव शक्ति की गरिमा को पुनः स्थापित करना-परम्परागत प्रबन्ध का श्रम के प्रति पदार्थवादी दृष्टिकोण’ था श्रमिक को बाजार की एक वस्तु, एक सेवक व निर्जीव साधन से अधिक महत्व नहीं दिया जाता था। उद्योगों में टेलरवाद के प्रसार के कारण भी श्रमिकों की स्थिति ऊँची नहीं उठ सकी श्रमिक उत्पादकता वृद्धि के उपकरण माने गये। किन्तु कालान्तर में प्रबन्धकों ने श्रम शक्ति के महत्व को पहचाना। प्रबन्ध प्रक्रिया सिद्धान्तों, लक्ष्यों व प्रबन्ध शैलियों का मानवीकरण करने तथा मानव शक्ति को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए लारेन्स एप्पले ने ‘प्रबन्ध को व्यक्तियों के विकास’ के रूप में परिभाषित किया है।

(v) व्यक्ति के सम्बन्ध में सकारात्मक धारणा-जो प्रबन्धक वस्तुओं के निर्देशन के स्थान पर व्यक्तियों के विकास को महत्व देते हैं। उनका व्यक्ति में सकारात्मक दृष्टिकोण होता है। वे मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति कार्य को एक बोझ नहीं, वरन् आनन्द की अनुभूति के रूप में देखता है, व्यक्ति सृजनशील होता है तथा उचित प्रेरणा के द्वारा उसकी रचनात्मक क्षमताओं को विकसित किया जा सकता है। ऐसे प्रबन्धक कर्मचारियों में निष्ठा, मनोबल एवं पारस्पारिक विश्वास के आधार पर ही अपनी प्रबन्ध प्रक्रिया प्रभावी बनाते हैं।

(vi) संगठनात्मक विकास व्यक्तियों की कार्यक्षमताओं एवं गुणों का विकास करके ही संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्ति की आन्तरिक क्षमताओं के विदोहन के द्वारा ही संस्था की समस्याओं का निराकरण किया जा सकता है। इसी दृष्टिकोण पर ‘विकास द्वारा प्रबन्ध’ की पद्धति विकसित हो रही है।

(vii) सामाजिक दायित्वों की पूर्ति लारेन्स एप्पले के इस कथन में प्रबन्ध द्वारा सामाजिक दायित्वों के निर्वाह की भावना का संकेत मिलता है। कर्मचारियों की शारीरिक, सामाजिक एवं मनोवेज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति एक महत्वपूर्ण प्रबन्धकीय दायित्व है। मास्लो (Maslow) के अनुसार, , व्यक्तियों की विभिन्न आवश्यकताओं, जैसे- शारीरिक, सुरक्षात्मक, सामाजिक, अहम् एवं सम्मान, आत्म विकास आदि को संतुष्ट करके ही उनको विकसित किया जा सकता है।

(viii) कार्य संस्कृति का विकास-प्रबन्ध व्यक्तियों के विकास एवं संतुष्टि पर ध्यान देकर संगठन में कार्य-संस्कृति का निर्माण करता है। व्यक्तियों में कार्य ‘कार्य ही पूजा है’ (Work is Workship) की भावना विकसित होती है तथा संगठन में कार्य-निष्ठा का वातावरण बनता है।

उपर्युक्त विवरणों से स्पष्ट है कि प्रबन्धकों द्वारा व्यक्तियों के विकास के लक्ष्य को स्वीकार करना ही वास्तविक प्रबन्ध है। क्योंकि व्यक्तियों के विकास के बिना लाभार्जन, दीर्घकालीन विकास, विस्तार, ग्राहक संतुष्टि व समाज कल्याण के लक्ष्यों को प्राप्त करना कभी भी सम्भव नहीं है। लारेन्स एप्पले का एक कथन प्रबन्ध की मानवीय एवं व्यवहारवादी विचारधारा पर जोर देता है। यह कथन प्रबन्धकों की मानवीय एवं व्यवहारवादी विचारधारा पर जोर देता है। यह कथन प्रबन्धकों के लिए एक अमूल्य मार्गदर्शन है कि व्यक्तियों के विकास से ही भौतिक साधनों का कुशलतम उपयोग किया जा सकता है। तथा प्रबन्धीय प्रक्रिया को प्रभावी बनाया जा सकता है।

लारेन्स एप्पले के इस कथन से प्रभावित होकर ‘बोर्ड ऑफ जनरल फूड्स कॉर्पोरेशन’ अमेरिका के अध्यक्ष क्लेरेंस फ्रान्सिस ने कहा था कि “मैं यह मानता हूँ कि व्यवसाय की सबसे महत्वपूर्ण सम्पत्तियाँ इसके मानवीय संसाधन हैं तथा इनके मूल्य में वृद्धि करना भौतिक लाभ एवं नैतिक दायित्व दोनों ही दृष्टि से आवश्यक है।” इसी प्रकार एक अमरीकी निगम के अध्यक्ष का कथन है कि “हम गाड़ियाँ, हवाई जहाज, रेफ्रीजरेटर, रेडियो अथवा जूते के फीते नही बनाते हैं, हम मनुष्य बनाते हैं जो वस्तुओं का निर्माण करते हैं।”

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