Business Management

सांयोगिक दृष्टिकोण से आपका क्या तात्पर्य है ? इसकी विशेषताएँ एवं उपयोगिता समझाइए ।

सांयोगिक अथवा आकस्मिकता दृष्टिकोण का अर्थ (Meaning of Contingency Approach)

सांयोगिक विचारधारा का मूलभूत आधार यह है कि, “प्रबन्ध करने की कोई एकाकी श्रेष्ठ विधि नहीं है वरन् सब कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करता है (कब, कैसे एवं कौन-सी समस्या उत्पन्न हो जायेगी, इसका पूर्वानुमान लगाना कठिन है)। अतः प्रबन्धक का कार्य यह पता लगाना है कि प्रबन्ध की कौन-सी तकनीक, विधि, प्रक्रिया अथवा सिद्धान्त किस परिस्थिति, दशा और समय विशेष में निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान करेगी।” यदि देखा जाये तो समस्त प्रकार के संगठन एवं समस्त प्रकार के नेतृत्व केवल कुछ निश्चित परिस्थितियों में ही कार्य करते हैं। अतः परिस्थित्यात्मक (Situational) घटक उचित संगठन संरचना एवं उपयुक्त प्रबन्ध शैली के निर्धारण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कोई भी प्रबन्ध तकनीक, प्रक्रिया, सिद्धान्त अथवा संगठन संरचना समस्त परिस्थितियों एवं समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती है। यदि देखा जाये तो परिणामों में भिन्नता का कारण परिस्थितियों की भिन्नता है। किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए हमें सबसे पहले परिस्थिति का व्यापक रूप में अध्ययन करना होगा और तदनुसार हमें प्रबन्धकीय कदम उठाना होगा। इस प्रकार तकनीकी, आर्थिक तथा सामाजिक दशाएँ, मानवीय संसाधन आदि में सभी महत्वपूर्ण घटक एक सांयोगिक संगठन संरचना को विकसित करने में ध्यान रखे जाते हैं। ध्यान रहे कि प्रबन्ध की सांयोगिक विचारधारा प्रबन्ध सिद्धान्तों तथा तकनीकों की सार्वभौमिकता को नकारती नहीं है वरन् उनकी व्यावहारिक उपयोगिता की परख करने का परामर्श देती है।

सांयोगिक विचारधारा इस बात पर बल देती है कि प्रबन्धकीय क्रियाएँ तथा संगठनात्मक आकार दोनों विद्यमान परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए। इस दृष्टि से एक विशिष्ट प्रबन्धकीय क्रिया एक विशिष्ट स्थिति में ही वैध है। प्रबन्ध में कोई एक विचारधारा सर्वोत्तम नहीं है क्योंकि सभी कुछ परिस्थिति पर निर्भर करता है। प्रबन्धक क्या करता है-यह दी हुई परिस्थिति पर निर्भर करेगा क्योंकि परिस्थितियों के चरों तथा प्रबन्धकीय क्रियाओं के मध्य सक्रिय आन्तरिक सम्बन्ध विद्यमान हैं। सांयोगिक विचारधारा इन आन्तरिक सम्बन्धों का विश्लेषण करने एवं उन्हें समझने का प्रयास करती है, ताकि विशिष्ट प्रबन्धकीय कदम उठाया जा सके।

सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि सांयोगिक दृष्टिकोण के अनुसार, प्रत्येक प्रबन्धक को यह निर्धारित करना होता है कि विशिष्ट परिस्थिति या दशाओं में प्रबन्ध की कौन-सी तकनीक उपयोग की जानी चाहिए ताकि प्रबन्धकीय लक्ष्यों को श्रेष्ठ ढंग से प्राप्त किया जा सके। अतः स्पष्ट है कि प्रबन्ध पूर्व अथवा रेडीमेड नहीं है, बल्कि प्रत्येक परिस्थिति का परिणाम है।

सांयोगिक विचारधारा या दृष्टिकोण के तत्व (Elements of Contingency Approach) सांयोगिक विचारधारा के मूलभूत निम्न तीन तत्व है-

(1) पर्यावरण ( Environment), (2) प्रबन्ध अवधारणाएँ एवं तकनीकें (Management Concepts and Techniques), तथा (3) उनके मध्य सांयोगिक सम्बन्ध (Continegent Relationship)। सायोगिक विचारधारा या दृष्टिकोण का

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण मान लीजिए कि एक व्यावसायिक उपक्रम के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए वहाँ पर कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति में प्रतिष्ठित प्रबन्ध विचारक कार्य सरलीकरण योजना लागू करने का सुझाव देंगे। व्यवहारवादी प्रबन्ध विचारक कार्य के वातावरण को कार्य एनरिचमेन्ट योजना द्वारा मनोवैज्ञानिक रूप से अभिप्रेरित करने का सुझाव देंगे। इसके विपरीत, सांयोगिक विचारधारा को अपनाने वाले प्रबन्धक पहले तो विद्यमान परिस्थिति एवं पर्यावरण का विस्तृत रूप में अध्ययन करेंगे। तत्पश्चात् यह पता लगाने की चेष्टा करेंगे कि विद्यमान परिस्थितियों में कौन-सी सर्वोत्तम प्रबन्ध तकनीक, विधि अथवा सिद्धान्त कार्य करेगा। वे यह देखेंगे कि यदि कर्मचारी अकुशल हैं और संसाधनों का अभाव है तो कार्य सरलीकरण की योजना अपनाना श्रेष्ठ रहेगा। इसके विपरीत, यदि कर्मचारी कुशल है और उनकी योग्यता में प्रबन्धक गर्व का अनुभव करता है तो वे कार्य एनरिचमेण्ट योजना को लागू करने का निर्णय लेंगे। इस उदाहरण से यह पूर्णतया स्पष्ठ हो जाता है कि सांयोगिक विचारधारा विद्यमान परिस्थिति एवं पर्यावरण की आवश्यकता के अनुरूप प्रबन्ध करने पर बल देती है।

सांयोगिक दृष्टिकोण या विचारधारा की विशेषताएँ (Characteristics of Contingency Approach)

सांयोगिक दृष्टिकोण या विचारधारा की विशेषताओं को निम्न प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं (1) यह दृष्टिकोण प्रबन्ध विधि एवं निर्णयों को वातावरण से जोड़ने पर बल प्रदान करता है। (2) यह दृष्टिकोण निर्णयों एवं कार्यों को करने से पूर्व उनके प्रभावों से उत्पन्न होने वाले * परिणामों पर भी ध्यान देता है।

(3) यह दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि परिस्थितियों में भिन्नता के कारण परिणाम भी भिन्न (4) यह दृष्टिकोण यह मानता है कि प्रबन्धकों का प्रत्येक निर्णय एवं कार्य परिस्थिति पर निर्भर होते हैं।

(5) यह दृष्टिकोण विभिन्न प्रबन्ध सिद्धान्तों के महत्व से इन्कार नहीं करता, बल्कि उनको व्यावहारिक बनाने पर बल प्रदान करता है।

(6) यह दृष्टिकोण प्रबन्धकीय ज्ञान का उपयोग करने के पूर्व वास्तविक दशाओं तथा भावी परिणामों का अनुभव करने पर बल प्रदान करता है।

(7) सांयोगिक दृष्टिकोण के अनुसार नेतृत्व की कोई भी एक शैली सभी परिस्थितियों में उपयुक्त सिद्ध नहीं हो सकती।

(8) इस दृष्टिकोण के अनुसार कोई भी प्रबन्ध तकनीक, प्रक्रिया या सिद्धान्त प्रत्येक परिस्थिति या समस्या का समाधान नहीं कर सकती। अतः इनको अपनाते समय तात्कालिक परिस्थितियों, प्रसंग, सांयोगिक घटनाओं आदि को ध्यान में रखना होता है।

सांयोगिक विचारधारा तथा नेतृत्व की शैली (Contingency Approach and Style of Leadership)

सांयोगिक विचारधारा इस बात पर बल देती है कि नेतृत्व की कोई भी एक शैली सभी परिस्थितियों में कदापि उपयुक्त नहीं हो सकती है। नेतृत्व शैली की प्रभावशीलता परिस्थितियों के •अनुसार अलग-अलग होगी। उदाहरण के लिए, भागिता नेतृत्व शैली ऐसे संगठन में सर्वाधिक प्रभावी होगी जहाँ पर तकनीकी दृष्टि से उच्च कुशल की प्रभावशीलता परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होगी। उदाहरण के लिए, भागिता नेतृत्व शैली में कर्मचारी कार्य करते हैं एवं उन्हें विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता होती है। इसके विपरीत, तानाशाही नेतृत्व शैली वहाँ पर सर्वाधिक प्रभावी होगी जहाँ पर अकुशल कर्मचारीगण सामान्य प्रकृति का कार्य करते हैं तथा सत्ता के प्रति पूर्ण भक्ति रखते हैं। कोई भी व्यक्ति आदेशों के उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं कर सकता।

सांयोगिक विचारधारा या दृष्टिकोण की उपयोगिता अथवा गुण (Utility of Merits of Contingency Approach)

(1) प्रबन्ध के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक भावी विकास के क्षेत्र में निश्वयात्मक रूप में सांयोगिक दृष्टिकोण की महत्वपूर्ण भूमिका विद्यमान है

(2) प्रबन्ध की अन्य समस्त दृष्टिकोण या विचारधाराओं का समामेलन सांयोगिक ढाँचे के अन्तर्गत किया जा सकता है।

(3) इस विचारधारा का उपयोग मोर्चाबन्दी करने, प्रभावी संगठन की संरचना करने, सूचना पद्धति का नियोजन करने, सन्देशवाहन एवं नियन्त्रण पद्धतियों की स्थापना करने, अभिप्रेरणा तथा नेतृत्व विचारधाराओं का प्रारूप निर्धारित करने, मतभेदों का निपटारा कराने तथा प्रबन्ध के क्षेत्र में परिवर्तन आदि करने में किया जा सकता है।

(4) यह दृष्टिकोण संगठनों की विविधात्मक पद्धतियों को उजागर करती है तथा यह समझती है कि संगठन विभिन्न परिस्थितियों में किस प्रकार कार्य करते हैं।

(5) इसकी सहायता से प्रबन्धक ऐसी क्रियाओं का निर्माण कर सकते हैं जोकि सम्बन्धित परिस्थितियों में सर्वाधिक उपयुक्त हों।

(6) यह विचारधारा प्रबन्धकों को कार्य करने एवं निर्णय लेने में स्वतन्त्रता प्रदान करती है।

(7) यह दृष्टिकोण प्रबन्धकों को परिस्थिति की जटिलताओं के विषय में सचेत करता है। यह परिस्थिति की अनिश्चितताओं, जोखिमों एवं दुष्प्रभावों से संगठन की रक्षा करती है।

सांयोगिक विचारधारा के दोष अथवा सीमाएँ (Demerits or Limitations of Contingency Approach)

सांयोगिक विचारधारा की विभिन्न उपयोगिताओं के होते हुए तथा उज्ज्वल भविष्य के होते हुए. भी इसमें निम्न महत्वपूर्ण कमियाँ अथवा सीमाएँ दृष्टिगोचर होती है-

(1) सांयोगिक विचारधारा पर उपलब्ध वर्तमान साहित्य सर्वथा अपर्याप्त है।

(2) यह विचारधारा पर्यावरण पर प्रबन्ध अवधारणाओं एवं तकनीकों के प्रभाव को मान्यता प्रदान नहीं करती है।

(3) यह विचारधारा भ्रम उत्पन्न करती है। इस विचारधारा का वाक्य ‘सब कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करता है’ भ्रम उत्पन्न करता है। इसका कारण प्रबन्ध के समक्ष कोई निश्चित सिद्धान्त नहीं होते हैं अपितु उसे हर बार वैकल्पिक उपाय खोजने पड़ते हैं जिसके कारण भ्रम उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

(4) यह विचारधारा अपेक्षाकृत अधिक जटिल है।

(5) यह विचारधारा प्रबन्धक को यह बताने में असमर्थ है कि अमुक परिस्थिति में अमुक विधि अपनायी जाये।

(6) एक परिस्थिति विभिन्न तत्वों से प्रभावित होती है और अल्प-अवधि में इन सभी तत्वों का विश्लेषण किया जाना कठिन है।

निष्कर्ष (Conclusion)

उपरोक्त विवेचन के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सांयोगिक विचारधारा प्रबन्ध के क्षेत्र में आधुनिक विचारधारा है एवं इसका भविष्य निश्चयात्मक रूप से उज्ज्वल है। हाँ, आवश्यकता इस बात की है कि खोज एवं अनुसन्धान करके इस पर अधिकाधिक साहित्य सृजन किया जाये ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button