Business Management

प्रबन्ध से आप क्या समझते हैं ? इसकी प्रकृति को समझाइए ।

प्रबन्ध का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Management)

वर्तमान जटिल व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धा के युग में प्रबन्ध को अनेक अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है। वास्तव में प्रबन्ध दूसरों से काम लेने की युक्ति है। किसी उपक्रम में काम करने वाले श्रमिकों के लिए प्रबन्ध सोचता है कि किस प्रकार श्रमिकों से अच्छे ढंग से काम लिया जा सकता है। प्रबन्ध ही यह निर्णय लेता है कि ‘वास्तव में क्या करना है’ और उसे करने का उत्तम तरीका क्या है ? इस प्रकार प्रबन्ध का अभिप्राय दूसरे व्यक्तियों से कार्य सम्पन्न कराना है जिससे पूर्व निर्धारित उद्देश्यों या लक्ष्यों को निर्धारित समयावधि में प्राप्त किया जा सके।

(1) जेम्स एल. लुण्डी (James L. Lundy) के अनुसार, “प्रबन्ध मुख्य रूप से विशिश्ट उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए दूसरों के प्रयत्नों को नियोजित, समन्वित, प्रेरित तथा नियन्त्रित करने का कार्य (2) एफ. डब्ल्यू. टेलर (F. W. Taylor) के अनुसार, “प्रबन्ध यह जानने की कला है कि आप लोगों से क्या कराना चाहते हैं, तत्पश्चात् यह देखना कि वे इसे सर्वोत्तम एवं मितव्ययितापूर्ण ढंग से कर रहे हैं अथवा नहीं।”

(3) हेनरी फेयोल (Henry Fayol) के अनुसार, “प्रबन्ध करने से आशय पूर्वानुमान लगाना एवं योजना बनाना, संगठन करना, आदेश एवं निर्देश देना, समन्वय करना तथा नियन्त्रण करने से है।””

(4) क्लॉग (Clough) के अनुसार, “प्रबन्ध निर्णय लेने और नेतृत्व करने की कला और विज्ञान है। ”

(5) जे. एन. शुल्जे (J.N. Schulze) के अनुसार, “प्रबन्ध वह शक्ति है, जो पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संगठन का नेतृत्व, मार्गदर्शन एवं संचालन करता है।”

प्रबन्ध की प्रकृति या स्वभाव (Nature of Management)

प्रबन्ध की प्रकृति बहु-दिशायी है। प्रबन्ध को विभिन्न विद्वान् भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से देखते हैं अतः इसकी प्रकृति या स्वभाव से स्पष्ट नहीं हो पाता है। फिर भी प्रबन्ध की अवधारणाओं एवं विशेषताओं के आधार पर इसकी प्रकृति के सम्बन्ध में निम्नांकित पहलू प्रतिपादित किये जा सकते हैं

(1) प्रबन्ध एक जन्मजात या अर्जित प्रतिभा है-प्राचीन समय में अधिकांश लोगों की यह धारणा रही है कि ‘प्रबन्ध एक जन्मजात प्रतिभा है’ अर्थात् ‘प्रबन्धक पैदा होते हैं, उन्हें बनाया नहीं जा सकता। इस धारणा के पीछे यह मान्यता थी कि कुशल प्रबन्ध करने के लिए जिन गुणों व विशेषताओं की आवश्यकता होती है, वे कुछ व्यक्ति विरासत में लेकर पैदा होते हैं, किन्तु ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं प्रशिक्षण की सुविधाओं के विकास ने इस विचारधारा को परिवर्तित कर दिया। आज व्यवसाय का स्वामित्व तथा प्रबन्ध अलग-अलग हो गये हैं। प्रबन्धकों का स्थान प्रशिक्षित तथा पेशेवर लोग ग्रहण करने लगे हैं। ऐसी स्थिति में प्रबन्ध को जन्मजात प्रतिभा नहीं कह सकते हैं। वर्तमान समय में ऐसे अनेक प्रबन्धक है जिन्होंने प्रबन्ध विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त विभिन्न उपलब्धियाँ प्राप्त की, जबकि उनके माता-पिता का प्रबन्ध से कोई सम्बन्ध नहीं रहा। अतः यह कहा जा सकता है कि *प्रबन्ध एक जन्मजात प्रतिभा नहीं है, वरन, अर्जित प्रतिभा भी है।”

(2) प्रबन्ध सार्वभौमिक या सर्वव्यापी है-प्रबन्ध एक सार्वभौमिक क्रिया है, जो प्रत्येक संस्था में, चाहे वह सामाजिक संस्था हो अथवा धार्मिक, राजनैतिक हो अथवा व्यावसायिक, समान रूप से सम्पन्न की जाती है। निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि प्रबन्ध के सिद्धान्त एवं कार्य काफी सीमा तक अपनी सार्वभौमिकता की प्रकृति को दर्शाते हैं, किन्तु संगठन की प्रकृति, आकार एवं पृष्ठभूमि के अनुसार उन्हें लागू करने की परिस्थितियाँ भिन्न हो सकती हैं। प्रबन्ध के सिद्धान्त लोचक एवं किन्हीं भी परिस्थितियों में आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाये जा सकते हैं।

(3) प्रबन्ध विज्ञान एवं कला है-प्रबन्ध कला है या विज्ञान अथवा दोनों ही है, इस तथ्य की सत्यता का पता लगाने के लिए यह आवश्यक है कि प्रबन्ध कला के रूप में तथा प्रबन्ध विज्ञान के रूप में क्यों है, इसका अलग-अलग अध्ययन करेंगे प्रबन्ध एक विज्ञान है-ज्ञान की किसी भी शाखा का क्रमबद्ध व व्यवस्थित अध्ययन ‘विज्ञान’ कहलाता है। यह ज्ञान का वह स्वरूप है जिसमें अवलोकन व प्रयोग द्वारा सिद्धान्त बनाये जाते हैं एवं कारण व परिणाम में सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। अतः किसी भी प्रकार के व्यवस्थित ज्ञान को विज्ञान कहते हैं जो एक निश्चित सिद्धान्तों पर आधारित हो अर्थात् ज्ञान का वह स्वरूप जिसमें अवलोकन है, विज्ञान कहलाता है।

विज्ञान को हम दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं– (अ) वास्तविक विज्ञान अर्थात् ‘क्या है ?’, तथा (ब) आदर्श या नीति प्रधान विज्ञान अर्थात् ‘क्या होना चाहिए ?’ का ज्ञान । वास्तविक विज्ञान में हम वर्तमान अवस्था का ही विश्लेषण करते हैं, जबकि नीति प्रधान विज्ञान में हम आदर्श का निर्धारण करते हैं।

जब हम प्रबन्ध को कसौटी पर कसने का प्रयास करते हैं तो सहज ही कई प्रश्न खड़े होते हैं- (i) क्या प्रबन्ध अवलोकन, सर्वेक्षण, प्रयोग एवं कारण व परिणाम के सम्बन्धों पर आधारित है ? (ii) क्या प्रबन्ध के सिद्धान्त सार्वभौमिक है ? (iii) क्या प्रबन्ध की कोई सर्वसम्मत विचारधारा है ? इस अवधारणा के प्रवर्तक यह मानते हैं कि प्रबन्ध के कुछ सिद्धान्त तो पूर्णतः विकसित सिद्धान्तों का रूप ले चुके हैं, जबकि कई सिद्धान्त अभी विकास की अवस्था में हैं। प्रबन्ध के सिद्धान्त कारण- परिणाम सम्बन्धों से जुड़े हुए हैं तथा वे व्यापक प्रयोगों, अवलोकन, परीक्षणों एवं व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित हैं। ये सिद्धान्त सार्वभौमिक भी हैं और प्रबन्ध की सर्वमान्य, विचारधारा का भी प्रतिनिधत्व करते हैं। दूसरे शब्दों में, एक विज्ञान के रूप में प्रबन्ध अपने नियमों, सिद्धान्तों, तकनीकों, विधियों आदि के साथ नवीन आयामों के साथ सतत् रूप से विकसित हो रहा है।

निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि प्रबन्ध एक विकासमान व गतिमान विज्ञान है, जो मानवीय व्यवहार से सम्बन्ध रखता है। अतः भौतिक व रासायनिक विज्ञान की तरह यह निश्चित व सही विज्ञान नहीं हो सकता। प्रबन्ध एक सरल एवं लचीला विज्ञान है, जो कठोर नियमों द्वारा बद्ध नहीं किया जा सकता। प्रबन्ध चिकित्सा विज्ञान तथा इंजीनियरिंग के सदृश है, जिनमें सैद्धान्तिक और व्यवहारिक ज्ञान के समन्वित उपयोग की जरूरत होती है।

प्रबन्ध कला भी है–कला का अभिप्राय ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग से होता है। टेरी के अनुसार, कुशलतापूर्वक प्रयोग से वांछित परिणाम की प्राप्ति ही कला है। कला आदर्श विज्ञान द्वारा निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के साधन बतलाती है। कला उन रीतियों एवं विधियों को प्रस्तुत करती है, जिनके माध्यम से आदर्श की प्राप्ति हो और अवांछनीय बातें अलग रह जायें। दूसरे शब्दों में, कला उपलब्ध ज्ञान के व्यावहारिक प्रयोग की एक विधि है। टेलर के शब्दों में, ‘प्रबन्ध’ का तीन-चौथाई ज्ञान व्यावहारिक है और एक-चौथाई सामान्य ज्ञान है। श्रेष्ठ परिणामों की प्राप्ति हेतु सैद्धान्तिक ज्ञान को व्यावहारिक ज्ञान से पुष्ट करना आवश्यक है और कला यही काम करती है। कला का आशय यह जानना है कि कोई काम किस प्रकार से किया जा सकता है और उसे वस्तुतः उसी प्रकार करना चाहिए।

प्रबन्ध कला तथा विज्ञान दोनों ही है-प्रबन्ध में कला तथा विज्ञान दोनों की विशेषताओं का समावेश है। प्रबन्ध एक सामाजिक विज्ञान है, भौतिक विज्ञान नहीं। कला तथा विज्ञान दोनों ही प्रबन्ध को पूर्णता प्रदान करते हैं और इसलिए दोनों एक-दूसरे के पूरक है। इसीलिए रॉबर्ट एन. हिलकार्ट का कहना है कि प्रबन्ध क्षेत्र में कला तथा विज्ञान एक सिक्के के दो पहलू है। प्रबन्ध के सिद्धान्त केवल वास्तविक स्थिति का ही विश्लेषण नहीं करते, अपितु आदर्श विधियों की ओर भी संकेत करते हैं जिनके प्रयोग से सर्वोत्तम, सर्वाधिक तथा सस्ता उत्पादन सम्भव हो सकता है। प्रबन्ध के सिद्धान्त हमें बतलाते हैं कि आदर्श मजदूरी या पूर्ण रोजगार के बिन्दु तक पहुँचने के लिए हमें किन-किन व्यावहारिक नियमों का पालन करना चाहिए। न्यूनतम लागत पर अधिकतम तथा श्रेष्ठतम उत्पादन कैसे प्राप्त हो सकता है।

उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि प्रबन्ध विज्ञान ही नहीं, बल्कि कला भी है। प्रबन्ध जहाँ विज्ञान के रूप में सिद्धान्तों एवं नियमों का प्रतिपादन करता है, वहाँ कला के रूप में इन सिद्धान्तों एवं नियमों को प्रतिपादित करता है।”

(4) प्रबन्ध एक पेक्षा है-वर्तमान युग में प्रबन्ध का नया स्वरूप सामने आया है। प्रबन्ध एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति न रहकर एक विशिष्ट विज्ञान के रूप में विकसित हुआ है जिसमें विशेष ज्ञान एवं चातुर्य की आवश्यकता होती है इसलिए प्रबन्ध पेशे के रूप में विकसित हुआ है। पेशा वास्तव में निश्चित प्रतिफल के बदले विशिष्ट तकनीकी ज्ञान एवं योग्यता के आधार पर लोगों की सेवा के उद्देश्य से किया जाने वाला एक धन्धा है। प्रबन्ध में भी पेशो के समान निश्चित ज्ञान एवं तकनीकी योग्यता की आवश्कयता होती है और इसको प्राप्त करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाता है। वर्तमान समय में बिना प्रबन्ध विज्ञान की जानकारी के सफलता पाना कठिन है। अतः आज के युग में प्रबन्ध पेशे के रूप में विकसित हुआ है।

(5) प्रबन्ध एक जटिल एवं सतत् सामाजिक कार्य विधि है-कार्य-विधि का रूप निश्चित कर देने से अर्थात् हमें कौन-सा कार्य कैसे करना चाहिए और दूसरों से क्या अपेक्षा करनी चाहिए यह निर्धारित कर देने से ही उद्देश्य में सफलता नहीं मिलती है, वरन् पुराने ढंग त्यागकर उनके स्थान पर नये ढंग अपनाये जा सकते हैं। प्रबन्ध भी एक कार्य-विधि है क्योंकि इसके अन्तर्गत एक के बाद एक ऐसे अनेक कार्य करने पड़ते हैं जो निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होते हैं। अतः प्रबन्ध एक कार्य विधि है। मानवीय आचरणों एवं पारस्परिक सम्बन्धों से उसका घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण यह सामाजिक कार्य विधि है। प्रबन्ध एक जटिल कार्य है क्योंकि हमारा मस्तिष्क इसके सभी पक्षों को एक साथ ग्रहण करने में असमर्थ रहता है।

(6) प्रबन्ध का सामाजिक उत्तरदायित्व होता है-अपने महत्व के कारण प्रबन्ध आज समाज का महत्त्वपूर्ण अंग बन गया है। यह कहा जाने लगा है कि प्रबन्ध केवल एक नियोक्ता का प्रतिनिधि नहीं, अपितु सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधि है। ‘प्रबन्ध’ केवल अपने स्वामी के प्रति ही उत्तरदायी नहीं होता, वरन् सम्पूर्ण समाज के प्रति उसका उत्तरदायित्व होता है। अतः वह ऐसा कार्य नहीं कर सकता जो समाज की आशाओं, भावनाओं तथा आवश्यकताओं के प्रतिकूल हो। प्रबन्ध के ग्राहकों, कर्मचारियों, पूर्तिकत्ताओं, नियोक्ता, सरकार तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व होते हैं। निष्कर्ष रूप में प्रबन्ध का उत्तरदायित्व बहुदिशायी है, उसे एक प्रन्यासी या ट्रस्टी के रूप में काम करना चाहिए जिससे कि समाज के विभिन्न वर्गों के प्रति प्रबन्ध अपने उत्तरदायित्व का पालन कर सके।

(7) प्रबन्ध एक प्रणाली है-प्रबन्ध एक प्रणाली है। इसका तात्पर्य यह है कि प्रबन्ध किसी एक पहलू के स्थान पर सभी पहलुओं पर एक साथ विचार करने पर बल देता है। अर्थात् इसमें किसी एक भी भाग के अध्ययन के स्थान पर समग्र रूप से सभी भागों का अध्ययन किया जाता है। उदाहरणार्थ, हर एक संगठन में काम करने वाले व्यक्तियों का समूह होता है, जिनमें परस्पर औपचारिक सम्बन्ध होते हैं। इस समूह का हर एक व्यक्ति स्वतन्त्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए काम नहीं करता, अपितु संगठन के सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही काम करता है। अतः प्रबन्धकों को संगठन के प्रत्येक व्यक्ति की क्रिया को एक अंग के रूप में और सभी क्रियाओं को सम्मिलित रूप में ‘एक प्रणाली’ के रूप में स्वीकार करना चाहिए और तदानुसार प्रबन्ध का कार्य करना चाहिए।

(B) प्रबन्ध एक समग्र विचार है आधुनिक विचारक यह स्वीकार करने लगे हैं कि प्रबन्ध एक एकीकृत या समन्वित अवधारणा है। यह प्रत्येक समाज, राष्ट्र, संस्था तथा समय के सांस्कृतिक आदर्शों के अनुरूप आचरण करती है। इसे केवल नियोजन, संगठन, निर्देशन, समन्वय व नियन्त्रण तक ही सीमित रखना उचित नहीं है। इसे विज्ञान या कला के रूप में ही सीमित नहीं किया जा सकता। इसे सामाजिक प्रक्रिया के रूप में फेयोल द्वारा प्रतिपादित 14 सिद्धान्तों में बाँधकर प्रणाली के रूप में ही स्वीकार नहीं किया जा सकता। प्रबन्ध का क्षेत्र इन सबसे अधिक व्यापक है। आज प्रबन्ध को एक एकीकृत अभिकरण के रूप में मान्यता प्रदान की गई है।

प्रबन्ध का क्षेत्र (Scope of Management)

आधुनिक युग के प्रबन्ध का क्षेत्र अनेकानेक संगठित क्रियात्मक गतिविधियों तक विस्तृत हो गया है। प्रबन्ध शिक्षा समिति, लंदन के प्रतिवेदन में प्रबन्ध के क्षेत्र में निम्न क्रियात्मक गतिविधियों को शामिल किया गया है

(1) वित्तीय प्रबन्ध – इसमें आर्थिक पूर्वानुमान लेखांकन, लागत लेखांकन, लागत लेखा विधि, सांख्यिकी नियंत्रण, बजटीय नियंत्रण, बीमा और एक्चुरियल विधि शामिल हैं।

(2) उत्पादन प्रबन्ध – इसमें कार्य विश्लेषण, अनुसूचियन, नित्य क्रमन, नियोजन, किस्म नियंत्रण, समय और विधि अध्ययन शामिल हैं।

(3) विकास प्रबन्ध – इसमें सामग्री, मशीन और एवं व्यावहारिक शोध सम्मिलित हैं। औद्योगिक प्रक्रियाओं, संयंत्रों आदि में भौतिक विज्ञान के उपभोक्ता मांग तथा उत्पादन के बीच इन्हें संबंधित करना।

(4) वितरण प्रबन्ध-इसमें विपणन, क्रय-विक्रय उपभोक्ता शोध, विज्ञापन शामिल है।

(5) क्रय प्रबन्ध-इसमें निविदा पद्धति, ठेका पद्धति, भण्डारण एवं स्कन्ध नियंत्रण सम्मिलित है।

(6) परिवहन प्रबन्ध-इसका प्रबन्ध सड़क, रेल, जल एवं वायु परिवहन के साथ-साथ संवेष्टन एवं भण्डारण से है।

(7) अनुरक्षण प्रबन्ध-इसका संबंध भवन, संयंत्र, साज-सामान और सम्पदा कार्य को कार्यशील बनाये रखने से है।

(8) सेविवर्गीय प्रबन्ध-इसमें सेविवर्गियों का चयन, रोजगार, पदस्थापन, प्रशिक्षण, स्थानान्तरण, पदोन्नति, सेवानिवृत्ति के साथ-साथ कल्याणकारी सेवाएँ तथा सुरक्षा भी शामिल है।

(9) कार्यालय प्रबन्ध-इसमें सम्प्रेषण, अभिलेखन, तथा कार्यालय के आयोजन एवं नियंत्रण के संबंध में सभी प्रकार की व्यवस्था शामिल हैं।

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