Business Management

उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध क्या है ? इसके लाभ एवं सीमाओं का वर्णन कीजिए।

उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Management by Objectives)

इस पद्धति का संक्षिप्त नाम एम. बी. ओ. (M.B.O.) है। सामान्यतः यह माना जाता है कि उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध तकनीकी का विकास पीटर एफ. ड्रकर (Peter F. Drucker) द्वारा किया गया। प्रबन्ध जगत में इसे अनेक नामों से पुकारा जाता है, जैसे-लक्ष्यों द्वारा प्रबन्ध (Management by Goals), मिशन या प्रयोजन द्वारा प्रबन्ध (Management by Mission or Purpose), परिणामों द्वारा प्रबन्ध (Management by Results) आदि। पीटर एफ. ड्रकर ने अपनी पुस्तक ‘Practice of Management’ में उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध की मूलभावना को स्पष्ट करते हुए लिखा है “प्रत्येक व्यावसायिक उपक्रम को एक सही समूह (True team) का गठन करना चाहिए और वैयक्तिक प्रयासों को सामूहिक प्रयासों से जोड़ देना चाहिए। उपक्रम के प्रत्येक सदस्य का योगदान भिन्न-भिन्न हो सकता है परन्तु उन सभी का योगदान सामान्य लक्ष्य प्राप्त करने की ओर होना चाहिए” इस सम्बन्ध में ड्रकर द्वारा वर्णित तीन पत्थर काटने वालों की कहानी बड़ी ही सटीक प्रतीत होती है

जो निम्नानुसार है- “एक गिरजाघर के निर्माण कार्य में एक स्थान पर तीन पत्थर काटने वाले कार्य कर रहे थे जब उनसे प्रश्न पूछा गया कि वे क्या कर रहे हैं तो पहले ने उत्तर दिया कि मैं रोजी-रोटी कमा रहा हूँ, दूसरे ने उत्तर दिया कि मैं पत्थर काटने का सर्वोत्तम कार्य कर रहा हूँ तथा तीसरे ने उत्तर दिया कि मैं गिरजाघर का निर्माण कर रहा हूँ” वास्तव में यहाँ तीसरा व्यक्ति उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध की मूल भावना का प्रतीक है जो अपने कार्य में संस्था के सामान्य लक्ष्य को देखता है। आधुनिक प्रबन्ध की यह नवीनतम तकनीक है। प्रत्येक संस्था चाहे वह व्यावसायिक हो या गैर-व्यावसायिक, सरकारी हो या निजी क्षेत्र की, उसका कोई-न-कोई निश्चित लक्ष्य या उद्देश्य होता है जिसे प्राप्त करना प्रबन्ध का मुख्य कार्य है और ‘उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध’ वह तकनीक है जो संगठन के सभी प्रयासों को लक्ष्य प्राप्त की ओर निर्देशित करती है। इस प्रकार उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध एक व्यावहारिक विचारधारा है

जो लक्ष्यप्राप्ति की व्यूह रचना पर अधिक बल प्रदान करती है। इसके अन्तर्गत किसी संस्था के वरिष्ठ एवं अधीनस्थ प्रवन्धक संयुक्त रूप से एक निश्चित अवधि के लिए उपक्रम के उद्देश्यों को निर्धारित करते हैं, फिर उपक्रम के उद्देश्यों के अनुरूप प्रबन्ध के प्रत्येक स्तर के लिए उद्देश्य निर्धारित किये जाते हैं। इन्हीं उद्देश्यों को संस्था का संचालन करने एवं प्रत्येक प्रबन्ध के कार्यों का मूल्यांकन करने हेतु उपयोग में लाया जाता है। पीटर एफ. ड्रकर (Peter F. Drucker) के अनुसार, “उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध एक प्रणाली है

जिसमें प्रबन्धक एवं सम्पूर्ण प्रतिष्ठान दोनों की कार्य कुशलता में सुधार के लिए विभाग व्यक्तिगत प्रबन्ध के स्तर पर उद्देश्यों का निर्धारण किया जाता है।” तथा प्रत्येक आरिन उरिस (Auren Uris) के अनुसार, *मूल रूप से उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध एक सरल अवधारणा है, जो वांछित परिणामों से निर्देशित कार्य निष्पादन एवं उपलब्धि है।” टोसी एवं केरोल (Tosi and Carroll) के अनुसार, “उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध एक प्रक्रिया है जिसमें प्रबन्धक और उसके अधीनस्य दोनों मिलकर ऐसी निर्धारित क्रियाओं, लक्ष्यों, विधियों एवं उद्देश्य के बारे में सहमत हो जाते हैं जिनका उपयोग अधीनस्थों के निष्पादन एवं उसके मूल्यांकन के आधार के रूप में उपयोग किया जायेगा।

उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध की विशेषताएँ या लक्षण (Characteristics of Management by Objectives)

उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध के निम्नांकित लक्षण या विशेषताएँ हैं

(1) उद्देश्यों का निर्धारण (Determination of Objectives)- इसमें उपक्रम के उद्देश्य या लक्ष्य निर्धारित किये जाते हैं, फिर उसके अनुरूप विभिन्न विभागों के लिए लक्ष्य निर्धारित किये जाते है और उनका पालन किया जाता है। यह लक्ष्य कोई एक व्यक्ति निर्धारित नहीं करता बल्कि संचालक, प्रबन्धक, सहायक प्रबन्धक, विभागीय प्रबन्धक व उनके अधीनस्थों के सहयोग से निर्धारित किये जाते

(2) निष्पादन स्तर (Performance Standard)- इसके अन्तर्गत प्रत्येक प्रबन्धक का निष्पादन स्तर इस प्रकार से निश्चित किया जाता है कि वह संस्था के मूल उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक हो ।

(3) निष्पादन मूल्यांकन (Performation Appraisal)- इसमें प्रत्येक प्रबन्धक के निष्पादन का मूल्यांकन उनके लिए निर्धारित लक्ष्यों के सन्दर्भ में किया जाता है जिससे किसी भी समय आवश्यक सुधार किया जा सके।

(4) संगठन ढाँचा (Organisation Structure)- इसके अन्तर्गत संगठन का ढाँचा इस प्रकार का तैयार किया जाता है जिसमें प्रत्येक प्रबन्धक अपना निर्णय लेने के लिए स्वतन्त्र होता है।

(5) टीम भावना (Team Spirit) – यह सहयोग, सामूहिक प्रयास तथा टीम भावना पर बल देता है। यह कर्मचारी की अपेक्षाओं एवं प्रबन्धकीय व्यवहारों के मध्य विद्यमान खाई को पाटकर समन्वय स्थापित करता है।

(6) अभिप्रेरण (Motivation)- इसमें सामूहिक प्रयासों को लक्ष्य प्राप्ति की ओर अभिप्रेरित किया जाता है। इनमें कर्मचारियों को मौद्रिक तथा अमौद्रिक दोनों प्रकार का अभिप्रेरण देने का प्रावधान रहता है।

(7) नियन्त्रण सूचना (Control Information)- इसमें नियन्त्रण सूचना प्रबन्धकों के पास सही समय पर पहुँचती रहती है, जिससे वे अपने निर्णयों में सुधार लाने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहते हैं। इसके लिए प्रभावी संचार व्यवस्था का होना आवश्यक है।

(8) क्रियात्मक उद्देश्य (Functional Objectives) – इसमें क्रियात्मक उद्देश्य एवं संस्था के उद्देश्यों में इस प्रकार से सामंजस्य स्थापित किया जाता है कि यदि क्रियात्मक उद्देश्यों की प्राप्ति में कोई सन्देह हो तो उनमें तुरन्त आवश्यक परिवर्तन कर दिया जाता है।

उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध का महत्व (Importance of Management by Objectives)

वर्तमान समय में व्यावसायिक संस्थाओं का आकार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण प्रबन्धकीय समस्याओं में भी वृद्धि होती जा रही है। उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध एक समन्धित तरीके से उद्देश्य की प्राप्ति पर बल देता है, जिससे प्रबन्धकीय समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाता है। उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध के महत्व या लाभों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(1) कुशल निष्पादन (Efficient Performance)- उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध के अन्तर्गत उपक्रम एवं प्रबन्धकों के लिए लक्ष्यों का निर्धारण पहले से कर दिया जाता है और जो लक्ष्य निर्धारित किये जाते हैं, वे वास्तविकता के निकट होते हैं। संस्था के सभी व्यक्ति इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पूर्ण प्रयास करते हैं जिसके कारण प्रबन्धकों को कुशल निष्पादन में सहायता मिलती है।

(2) उच्च मनोबल (High Moral)- उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध पद्धति के अन्तर्गत संस्था के प्रबन्धकों एवं कर्मचारियों का मनोबल सदैव ऊँचा रहता है। ऐसी दशा में वे उद्देश्यों को भली प्रकार समझ जाते हैं तथा उन्हीं के अनुरूप कार्य करते हैं।

(3) प्रभावशाली संचार व्यवस्था (Effective Communication System)-उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध संस्था में संचार व्यवस्था को प्रभावशाली बनाता है। चूंकि इस पद्धति में शीर्ष प्रबन्ध एवं विभागीय प्रबन्धकों के मध्य खुलकर विचार-विमर्श होता है, अतः इससे संस्था में संचार या सम्प्रेषण व्यवस्था अधिक व्यवस्थित होती है जिसके परिणामस्वरूप उत्पादकता बढ़ती है।

(4) अधिकारी का प्रत्यायोजन (Delegation of Authorities) – उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध पद्धति में प्रबन्धकों को अपने-अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु आवश्यक निर्णय लेने एवं उनमें संशोधन करने की स्वतन्त्रता होती है। अपने-अपने क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रबन्धकों को पर्याप्त अधिकार प्रत्यायोजित किये जाते हैं जिससे आवश्यकता पड़ने पर उन्हें शीर्ष प्रबन्ध के आदेशों के इन्तजार में अपना समय व्यर्थ में ही नष्ट न करना पड़े।

(5) कार्य का निष्पादन (Performance of Work)-उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध पद्धति के अन्तर्गत प्रत्येक कर्मचारी एवं प्रबन्धक अपने-अपने लक्ष्यों एवं उद्देश्यों से परिचित होता है। लक्ष्यों की स्पष्टता के कारण वे अधिक निष्ठा एवं लगन से कार्य करते हैं। संस्था में कर्मचारियों के अन्दर स्वयं मूल्यांकन की भावना का विकास होता है। प्राप्त परिणामों की तुलना निर्धारित लक्ष्यों तथा मानदण्डों से करके कार्य का अच्छा मूल्यांकन संभव हो जाता है।

(6) मानवीय संसाधनों का सदुपयोग (Best Utilisation of Human Resources) – संस्था के मानवीय संसाधनों का अपेक्षाकृत अच्छा उपयोग संभव होता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहता है।

(7) टीम भावना का विकास (Development of Team Spirit) – उद्देश्य द्वारा प्रबन्ध से संगठन में टीम भावना का विकास होता है। सब प्रबन्धक अपने को एक टीम का सदस्य समझते हैं जिसमें प्रत्येक सदस्य टीम की सफलता के लिए महत्वपूर्ण योगदान देता है। इस प्रकार उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध संस्था में सामान्य लक्ष्यों या उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए प्रबन्धकों एवं कर्मचारियों दोनों में की सामूहिक रूप से मिलकर कार्य करने की भावना का विकास करती है इससे संस्था को लाभ होता

(8) लाभदायक क्रियाएँ (Profitable Activities) – उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध अपनाने से संस्था के प्रबन्धकों की क्रियाएँ केवल लाभदायक क्रियाओं पर आकर केन्द्रित हो जाती है।

उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध की प्रक्रिया या कार्यविधि (Procedure of Management by Objectives)

उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध की पद्धति के अन्तर्गत उठाये जाने वाले प्रमुख कदम निम्नलिखित है

(1) दीर्घकालीन लक्ष्य एवं रणनीतियों का निर्धारण उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध कार्यक्रम की सफलता के लिए यह जरूरी है कि संस्था के दीर्घकालीन लक्ष्यों का निर्धारण किया जाए तथा इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उपयुक्त रणनीतियों का चुनाव किया जाए। संस्था के आधारभूत उद्देश्यों पर पूर्ण विचार करने के बाद ही दीर्घकालीन लक्ष्य व रणनीति निर्धारित की जाती है।

(2) फर्म तथा विभिन्न विभागों के अल्पकालीन स्पष्ट लक्ष्यों का निर्धारण-उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध कार्यक्रम का दूसरा चरण है फर्म तथा उसके विभिन्न विभागों के लिए पृथक-पृथक स्पष्ट लक्ष्यों का निर्धारण जो एक निश्चित अल्पावधि में प्राप्त किये जा सकें। इस प्रकार के लक्ष्य उच्च प्रबन्ध तथा विभागीय प्रबन्धकों द्वारा मिलकर निर्धारित किये जाते हैं।

(3) व्यक्तिगत प्रबन्ध के उद्देश्य का लक्ष्य उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध में इसे कार्य योजना के नाम से जाना जाता है तथा यह तीसरा कदम है। इसमें प्रत्येक स्तर पर व्यक्तिगत आधार पर उद्देश्यों एवं 1 लक्ष्यों को निर्धारित किया जाता है। यह लक्ष्य स्पष्ट तथा संक्षिप्त होने चाहिए व्यक्ति की सामर्थ्य के अनुसार ही लक्ष्य निर्धारित किये जाने चाहिए तथा लक्ष्य ऐसे होने चाहिए जो रुचिकर एवं चुनौतीपूर्ण हो और व्यक्ति को कार्य करने के लिए अभिप्रेरित कर सकें।

(4) प्राप्त परिणामों का मूल्यांकन- उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध प्रक्रिया के इस कदम के अन्तर्गत निश्चित अवधि के पश्चात् निर्धारित प्रमापों एवं लक्ष्यों की तुलना में अब तक की गई प्रगति एवं परिणामों का मूल्यांकन किया जाता है। इसमें इस बात की जानकारी प्राप्त की जाती है कि प्रत्येक स्तर पर ही हमें लक्ष्य प्राप्ति में कितनी सफलता मिली है। (5) पुनरीक्षण तथा नियन्त्रण यह उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध कार्यक्रम का अन्तिम कदम है जिसमें सर्वोच्च प्रबन्ध विभिन्न विभागों के प्राप्त परिणामों के आधार पर कार्यक्रम का पुनरीक्षण करता है तथा जिन विभागों के परिणाम असन्तोषजनक पाये जाते हैं, उसमें सुधारात्मक कदम उठाये जाते हैं।

उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध की सीमाएँ (Limitations of Management by Objectives)

लाभों के साथ-साथ उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध की कुछ सीमाएँ भी हैं, जो निम्न प्रकार है

1. नीतियों तथा कार्य प्रणालियों की उपेक्षा-एम. बी. ओ. में प्रबन्धकों का ध्यान केवल उद्देश्यों पर केन्द्रित रहता है। प्रबन्धक अपने निर्णयों में नीतियों तथा कार्य प्रणालियों की उपेक्षा करते हैं। यदि प्रबन्धक नीतियों तथा कार्य प्रणालियों की अवहेलना करने लगते हैं, तो संस्था में समन्वय एवं स्थायित्व का कोई आधार नहीं रह जाता।

2. अधिक समय लेने वाली तकनीक प्रबंधकों द्वारा उद्देश्य निर्धारण करना, उसके बाद शीर्ष प्रबंधक द्वारा विचार-विमर्श के बाद उद्देश्यों को अन्तिम रूप देने में काफी समय लग जाता है। इसके पश्चात् जब प्रबंधक स्वयं अपना मूल्यांकन करते हैं और उसके बाद वह और उसके प्रबंधक दोनों मिलकर फिर कार्य का मूल्यांकन करते हैं। इस काम में भी अधिक समय लग जाता है।

3. कार्यक्रम को लागू करने में कमियाँ- एम. बी. ओ. कार्यक्रम ठीक प्रकार से लागू न किया जाने के कारण भी कभी-कभी असफल हो जाता है; जैसे–मूल्यांकन हेतु जल्दी-जल्दी मीटिंग न किया जाना, कर्मचारियों को परिणामों की प्राप्ति के अनुरूप इनाम या प्रतिफल न दिया जाना तथा प्रबंधकों व कर्मचारियों को एम. बी. ओ. तकनीकों का रिफ्रेशर प्रशिक्षण न दिया जाना आदि ।

4. उच्च प्रबन्ध के सहयोग में कमी- यद्यपि कम्पनी के संचालक तथा मुख्य प्रबन्धक उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध के महत्व को स्वीकार करते हैं परन्तु जब वे इसे अपने यहाँ लागू करते हैं तो अन्यत्र व्यस्त रहने के कारण कार्यक्रम निर्धारण में पूर्ण सहयोग नहीं कर पाते फलस्वरूप कार्यक्रमों के बाद में कठिनाई उत्पन्न होने लगती है।

5. सहयोग तथा समन्वय की आवश्यकता इसकी सफलता के लिए यह आवश्यक है कि विभिन्न प्रबंधक तथा कर्मचारी परस्पर एक-दूसरे से सद्भावना रखें तथा स्वस्थ सम्बन्ध रखें। यह भी जरूरी है कि उनमें आपस में ऐच्छिक सहयोग एवं समन्वय हो लेकिन वास्तव में ऐसा स्वस्थ वातावरण बहुत ही कम संस्थाओं में पाया जाता है।

6. गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता एम. बी. ओ. की सफलता के लिये यह भी जरूरी है कि प्रबंधकों को उद्देश्यों के निर्धारण तथा परिणामों के मूल्यांकन करने का गहन प्रशिक्षण दिया जाय। यह भी इसकी एक सीमा है।

7. लोच का अभाव- इस प्रणाली के अन्तर्गत उद्देश्यों में परिवर्तन करना भी अत्यन्त कठिन होता है। अनेक बार नीतियों, प्राथमिकताओं एवं परिस्थितियों में तेजी से परिवर्तन हो जाते हैं किन्तु उसके अनुरूप उद्देश्यों में परिवर्तन करना सम्भव नहीं हो पाता। अतः कभी-कभी प्रबन्धकीय वर्ग अनावश्यक, तथा अवास्तविक उद्देश्यों को ध्यान में रखकर उसी के अनुरूप कार्य कराने लगते हैं।

8. अधिक कागजी कार्य एम. बी. ओ. कार्यक्रम की प्रभावशीलता उस समय भी नष्ट हो जाती है जब कार्यक्रम में कर्मचारियों की सक्रिय भागीदारी की अपेक्षा कागजों पर अधिक कार्यवाही की जाने लगती है। कोरे प्रपत्रों को कर्मचारियों से भरवाकर मात्र कागजी कार्यवाही से एम. बी. ओ. का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो पाता।

उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध को प्रभावी बनाने हेतु सुझाव (Suggestions to make M.B.O. Effective)

1. स्पष्ट एवं निश्चित उद्देश्य संस्था के उद्देश्य निश्चित एवं स्पष्ट होने चाहिए।

2. वास्तविक उद्देश्य – उद्देश्य वास्तविक होना चाहिए अर्थात् ऐसे होना चाहिए जिन्हें अपने सुलभ उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध की प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिये जा साधनों से बिना किसी विशेष कठिनाई के प्राप्त किया जा सकता हो।

3. अधीनस्थो से मिलकर उद्देश्यों का निर्धारण – उद्देश्यों का निर्धारण उच्च प्रबन्धकों को अधीनस्थों से मिलकर करना चाहिए।

4. उद्देश्यों का निर्धारण परिस्थितियों के अनुरूप उद्देश्यों का निर्धारण सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

5. सभी सदस्यों को जानकारी उद्देश्यों की जानकारी सभी सदस्यों को दी जानी चाहिए।

6. टीम भावना उद्देश्यों द्वारा प्रबन्ध को अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रत्येक स्तर पर टीम भावना बनानी चाहिए।

7. संदेशवाहन की प्रभावी व्यवस्था संदेशवाहन की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए।

8. अभिप्रेरणा की उचित व्यवस्था-अभिप्रेरणा के लिए उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

Related Articles

One Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button