Business Management

प्रबन्ध से क्या आशय है ? प्रबन्ध के क्षेत्र में टेलर के योगदान को समझाइये।

औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप औद्योगिक क्षेत्रों में होने वाले परिवर्तनों ने प्रबन्ध की समस्याओं को अत्यन्त जटिल बना दिया, जिसके समाधान के लिए प्रबन्ध को विज्ञान के रूप में विकसित करने की आवश्यकता महसूस की गई।

सन् 1880 में एक आन्दोलन के प्रमुख प्रवर्तक अमेरिका के ‘फ्रेडरिक विन्सलो टेलर’ (Frederick Winslow Taylor) और फ्रांस के हेनरी फेयोल (Henri Feyol) थे।

टेलर ने सन् 1911 में ‘Principles of Scientific Management’ नामक पुस्तक प्रकाशित की और फेयोल ने सन् 1916 में ‘General and Industrial Management’ नामक पुस्तक की रचना की। ये दोनों पुस्तकें ऐसी प्रथम पुस्तकें हैं जिन्होंने प्रबन्ध विज्ञान के विकास के लिए आधारभूत साहित्य प्रदान किया। इन दोनों प्रवर्तकों द्वारा प्रतिपादित प्रबन्ध के सिद्धान्तों में अनेक असमानताएँ होते हुए भी कुछ भिन्नताएँ हैं। किन्तु इस तथ्य पर कोई दो मत नहीं हैं कि इन दोनों के प्रयासों ने प्रबन्ध- विज्ञान को पूर्ण बनाने में सक्रिय सहयोग दिया। टेलर को ‘वैज्ञानिक प्रबन्ध के जनक’ और फेयोल को ‘प्रबन्ध सिद्धान्तों के प्रतिपादक’ के रूप में जाना जाता है।

टेलर ने अमेरिका की एक स्टील कम्पनी में श्रमिक के रूप में भर्ती होकर चीफ इंजीनियर के रूप में अवकाश प्राप्त किया। टेलर ने अपने समय में प्रबन्ध के द्वारा प्रयोग की जाने वाली गलत नीतियों एवं उनकी कार्यक्षमता पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के सम्बन्ध में अनेक विचार प्रकट किये। टेलर ने अपने समय में देखा कि नेतृत्व तथा कार्य प्रगति के लिए अस्त-व्यस्त और अकुशल तरीके काम में लाये जाते हैं। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल मौद्रिक प्रलोभन ही एकमात्र साधन थे। टेलर ने अपने समय में यह भी देखा कि पर्यवेक्षण करते समय प्रबन्धक श्रमिकों के सिर पर खड़े रहते हैं जिससे उनके कार्य करने की स्वतन्त्रता का हनन होता है। टेलर ने उस समय यह भी महसूस किया कि कार्य करने का उचित वातावरण नहीं है, श्रमिकों के बीच कार्यों का बँटवारा भी उचित तरीके से नहीं होता, कर्मचारियों के हनन एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था भी दोषपूर्ण है और कार्य करने के लिए परम्परागत प्रणालियों का उपयोग किया जाता है। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए और अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर ऐसी प्रबन्ध व्यवस्था का सूत्रपात किया जिसे वैज्ञानिक प्रबन्ध की संज्ञा दी गयी।

प्रबन्ध के क्षेत्र में प्रो. टेलर के योगदान को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

(1) प्रबन्ध को विज्ञान का रूप प्रदान करना-टेलर प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने इस बात पर बल दिया कि ‘प्रबन्ध एक विज्ञान’ है तथा प्रत्येक प्रबन्धकीय समस्या को हल करने की ‘एक सर्वश्रेष्ठ विधि होती है जिसे उन्होंने वैज्ञानिक विधि का नाम दिया। विज्ञान की भाँति उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वैज्ञानिक विधि के प्रयोग द्वारा श्रमिकों की कार्यक्षमता व उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है। टेलर ने अपने वैज्ञानिक प्रबन्ध में ‘प्रयोगात्मक अध्ययनों’ पर भी अधिक बल दिया और उन्होंने इस सम्बन्ध में कहा कि कार्य का निर्धारण एवं विभाजन समय, गति और थकान अध्ययनों के आधार पर किया जाना चाहिए।

कर्मचारियों के प्रशिक्षण के सम्बन्ध में टेलर ने कहा है कि उन्हें ‘गलती करो और सुधारो’ के सिद्धान्त पर नहीं छोड़ देना चाहिए बल्कि प्रबन्धक को चाहिए कि वह तत्सम्बन्धित ज्ञान को पहले स्वयं प्राप्त करे और फिर इसके बाद समन्वित तरीके से इसे अपने सहायकों को दें। उन्होंने बताया कि कार्य की योजना पहले बना लेनी चाहिए एवं सभी सम्बन्धित कर्मचारियों को पहुँचा देनी चाहिए। कर्मचारियों से अधिक सहयोग प्राप्त करने के लिए उनसे ‘सुझाव’ लेने चाहिए। कर्मचारियों की कार्य कुशलता में वृद्धि करने के लिए कार्य दशाओं में सुधार किया जाना चाहिए।

(2) प्रबन्धकों के कर्तव्य-टेलर ने यह स्पष्ट कहा है कि प्रबन्धकों के तीन प्रमुख कार्य होते हैं (i) श्रमिकों द्वारा निष्पादित कार्य की विधि निर्धारित करना, प्रयोग किये जाने वाले यंत्रों को निर्धारित करना तथा उस समय को निर्धारित करना जिसमें कार्य पूर्ण होने चाहिए। (ii) कार्य के लिए योग्य व्यक्ति का चुनाव करना। (iii) उच्चस्तरीय निष्पादन के लिए श्रमिकों को प्रेरित करना।

(3) क्रियात्मक संगठन प्रणाली-टेलर ने क्रियात्मक संगठन प्रणाली का प्रतिपादन किया और कहा कि यदि विशिष्टीकरण एवं विभाजन के सिद्धान्तों को व्यवहार में लागू करना है तो क्रियात्मक संगठन प्रणाली को अपनाना चाहिए। इसके अन्तर्गत उन्होंने आठ टोली नायकों की नियुक्ति की बात कही।

(4) वैज्ञानिक प्रबन्ध की विधियाँ-टेलर ने वैज्ञानिक प्रबन्ध की निम्न विधियों का प्रतिपादन किया है, जो क्रमशः निम्नानुसार है- (i) समय-अध्ययन, (ii) गति अध्ययन, (iii) थकान अध्ययन, ((iv) नियोजन विभाग की स्थापना, (v) क्रियात्मक संगठन, (vi) श्रम बचत के साधनों व विधियों का उपयोग, (vii) कर्मचारियों के लिए कार्य निर्देश, (viii) परिव्यय लेखांकन, (ix) प्रेरणात्मक मजदूरी पद्धति तथा बोनस, (x) कार्य का युक्तिपूर्ण वितरण

(5) प्रबन्ध के सिद्धान्त-प्रबन्ध के परम्परागत सिद्धान्त पर टेलर ने निम्न वैज्ञानिक सिद्धान्त को प्रतिपादित किया- (i) कार्य अनुमान का सिद्धान्त, (ii) प्रयोग का सिद्धान्त, (iii) प्रमाणित कार्यदशाओं का सिद्धान्त, (iv) कार्य नियोजन का सिद्धान्त (v) प्रमापीकरण का सिद्धान्त, (vi) कर्मचारियों के वैज्ञानिक चयन व प्रशिक्षण का सिद्धान्त, (vii) सही व्यक्ति को सही कार्य का सिद्धान्त, (viii) विभेदात्मक मजदूरी का सिद्धान्त।

(6) मानसिक क्रान्ति-टेलर के मतानुसार मानसिक क्रान्ति वैज्ञानिक प्रबन्ध का सार है। इससे श्रम व प्रबन्ध एक-दूसरे से विरोधी न होकर सहयोगी बनकर कार्य करें। दोनों ही उद्योग रूपी चक्की के अनिवार्य पाट है तथा दोनों के सहयोग से ही उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है। मानसिक क्रान्ति से आशय, श्रम एवं प्रबन्ध के पारस्परिक विरोधी विचारों को बदलकर हितों की समानता तथा एकता पर बल देने से है। जब तक प्रबन्ध एवं श्रमिक एक-दूसरे को परस्पर सहयोगी नहीं समझेंगे, तब तक संस्था के लक्ष्यों की प्राप्ति असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य होती है। अतः प्रबन्ध को ऐसा वातावरण उत्पन्न करना चाहिए जिससे कि श्रमिक यह न समझे कि उनका शोषण किया जा रहा है। दूसरी ओर श्रमिकों को भी यह महसूस करा देना चाहिए कि उनको भी संस्था के हितों का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि संस्था के हित में ही उनका हित निहत है।

(7) श्रम संघ सम्बन्धी विचार-टेलर के मतानुसार श्रम संघ उत्पादन सीमित करते हैं तथा अनावश्यक कलह को जन्म देते हैं। उनकी यह मान्यता थी कि यदि श्रम व प्रबन्ध की नई विचारधारा अपनायें, तो श्रम संघों की आवश्यकता ही न होगी। उनकी यह धारणा थी कि श्रम संघ को छोड़ दें एवं सहकारी प्रतिष्ठान के एक सदस्य के रूप में प्रबन्धकों को अपना पूर्ण सहयोग दें जिससे उत्पादकता, मजदूरी व जीवन स्तर में वृद्धि हो सके।

(8) प्रेरणात्मक मजदूरी प्रणाली-प्रो. टेलर ने कारखानों में प्रेरणात्मक मजदूरी प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया। इससे श्रमिकों की कुशलता में वृद्धि होगी, वे मन लगाकर पूर्ण सहयोग के साथ अधिक उत्पादन करेंगे। टेलर ने अच्छे श्रमिकों को प्रोत्साहित करने एवं अकुशल श्रमिकों को अधिक कार्य करने के लिए अभिप्रेरित करने हेतु विभेदात्मक मजदूरी पद्धति अपनाने के लिए सुझाव दिया। इस पद्धति के लिए उन्होंने श्रमिकों को पारिश्रमिक देने की दो दरें बताई है-एक ऊँची और दूसरी नीची दर प्रभावित या प्रमाणित कार्य से अधिक कार्य करने वाले कर्मचारियों को ऊँची दर से पारिश्रमिक दिया जाये। इस पद्धति को अपनाने से प्रायः प्रत्येक कर्मचारी कम-से-कम प्रमापित कार्य करने के लिए अभिप्रेरित होगा।

(9) सामग्री व यन्त्रों के प्रमापीकरण पर बल-टेलर के मतानुसार, नियोजन विभाग का यह दायित्व है कि विशिष्ट वस्तु के निर्माण हेतु सर्वोच्च स्तर की सामग्री व मशीनों का प्रयोग किया जाए। ऐसी दशा में ही अधिक श्रेष्ठ व सस्ता उत्पादन सम्भव हो सकता है। टेलर के बाद उनके अनुयायियों और अन्य विद्वानों ने प्रबन्ध के वैधानिक दृष्टिकोण का विकास किया। इनमें इमर्सन, मॉरिस एल. कुक, एच. एल. गैट, एफ. बी. गिलबर्थ ओलिवर शैल्डन, मूने एवं रैले एवं चैस्टर आई. बर्नार्ड आदि का योगदान सराहनीय है।

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