Business Management

प्रबन्ध प्रक्रिया से आशय है ? प्रबन्ध प्रक्रिया के प्राथमिक कार्य क्या है ?

प्रबन्ध प्रक्रिया से आशय व परिभाषा (Meaning and Definition of Management Process)

प्रत्येक व्यावसायिक संस्था के कुछ निश्चित लक्ष्य होते हैं और इन लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु प्रबन्धक द्वारा प्रयुक्त प्रक्रिया ही प्रबन्ध प्रक्रिया है। प्रबन्ध वह व्यक्ति होते हैं जो अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर कार्य करते हैं और कार्य लेते हैं, जिससे कि किसी संस्था के लक्ष्यों की पूर्ति आसानी के साथ कर सके कार्य का बँटवारा, कर्मचारियों की क्रियाओं में समन्वय, उनके कार्यों पर नियन्त्रण रखना एवं उन्हें अधिक श्रेष्ठ कार्य करने के लिए अभिप्रेरित करना आदि प्रबन्धक के महत्वपूर्ण कार्य होते हैं। प्रबन्धक के इन सब कार्यों को ही सामूहिक रूप से प्रबन्ध प्रक्रिया कहते हैं। अंतः प्रबन्ध-प्रक्रिया से आशय संस्था के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए नियोजन, समन्वय, संगठन, अभिप्रेरणा, नियन्त्रण, निर्देशन, निर्णयन आदि कार्यों को करने से है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रबन्धक अपने कार्यों को जिस विधि एवं पद्धति से करते हैं, वह विधि व पद्धति ही प्रबन्ध-प्रक्रिया कहलाती है।

विलियम एच. न्यूमैन (William H. New man) के अनुसार, “प्रबन्ध प्रक्रिया में संगठन, नियोजन, नेतृत्व, मापन व नियन्त्रण आदि को सम्मिलित किया जाता है।

कूण्टज एवं ओ डोनेल (Koontz and O’Donnel) के अनुसार, “प्रबन्ध एक प्रक्रिया है जिसका सम्बन्ध निर्माण, नियोजन, संगठन, स्टाफिंग, निर्देशन, नियन्त्रण से है।”

प्रबन्ध प्रक्रिया के तत्व या अंग (Elements of Management Process)

प्रबन्ध प्रक्रिया के निम्नलिखित मुख्य तत्व है (1) नियोजन (Planning) – नियोजन प्रबन्ध-प्रक्रिया का प्रथम और महत्वपूर्ण अंग है। इसके अन्तर्गत संस्था के उद्देश्य निर्धारित किये जाते हैं तथा उन्हें प्राप्त करने के लिए नीतियों, कार्यक्रमों, विधियों एवं व्यूह रचना का निर्माण किया जाता है। दूसरे शब्दों में, नियोजन, एक ऐसा कार्यक्रम है जिसके द्वारा हम यह निश्चित करते हैं कि क्या करना है, कब करना है, कहाँ पर करना है, कैसे करना है, क्यों करना है तथा परिणामों का मूल्यांकन कैसे किया जायेगा। नियोजन के अन्तर्गत निम्न तत्वों को सम्मिलित किया जाता है

(i) लक्ष्य एवं उद्देश्य निश्चित करना, (ii) नीतियों का निर्माण करना, (iii) कार्य-विधि निश्चित करना, (iv) नियम व उपनियमों का निर्माण करना, (v) बजट बनाना, (vi) कार्यक्रम निश्चित करना, (vii) मोर्चाबन्दी या व्यूह रचना का निर्माण करना।

(2) संगठन (Organisation)- नियोजन जिन उद्देश्यों व कार्यक्रमों को निर्धारित करता है, उनके क्रियान्वयन के लिए संगठन एक साधन या उपकरण है। प्रबन्धक इस कार्य के अन्तर्गत मानव, माल, मशीन एवं अन्य प्रसाधनों में परस्पर सम्बन्ध स्थापित करता है, जिससे कि न्यूनतम लागत पर निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सके।

(3) निर्णयन (Decision-making)-प्रक्रिया के इस अंग में प्रबन्ध अनेक बातों के सम्बन्ध में यह निर्णय लेता है कि कोई कार्य कैसे सम्पन्न किया जाये, कर्मचारियों व अधिकारियों में मधुर समन्वय कैसे किया जाए, मानवीय और भौतिक साधनों पर किस प्रकार नियन्त्रण रखा जाए, कच्चे माल की प्राप्ति कहाँ से सस्ती, अच्छी व निरन्तर हो सकती है, बाजार विस्तार के लिए क्या कार्य किये जायें, आदि जिससे उपक्रम में पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति सुचारू रूप से हो सके।

(4) अभिप्रेरणा (Motivation)- इसके अन्तर्गत कर्मचारियों को खुश करने के लिए अनेक प्रेरणात्मक योजनाएँ बनायी जाती है। प्रलोभन दिए जाते हैं जिससे वे पूर्ण लगन, क्षमता व ईमानदारी से अपने कार्य को समय एवं न्यूनतम लागत पर सम्पन्न कर सकें ।

(5) नियन्त्रण शक्ति (Controlling Power)- इसके अन्तर्गत प्रगति रिपोर्ट, सुधारात्मक कार्यवाही करके समूचे कार्य की समीक्षा किए जाने की व्यवस्था की जाती है जिससे व्यक्ति जो कार्य कर रहे हैं, उसकी जाँच का निरीक्षण होता रहे अर्थात् यह जानकारी प्राप्त हो सके कि वे अपने कार्यों को सन्तोषजनक ढंग से सम्पन्न कर रहे हैं या नहीं। साथ ही समय, श्रम, पूँजी, यन्त्र, कच्चे माल आदि की बर्बादी न हो यह जानकारी भी प्राप्त की जाती है।

प्रबन्ध एक सार्वभौमिक प्रक्रिया के रूप में (Management as an Universal Process)

प्रबन्ध को एक सार्वभौमिक प्रक्रिया के रूप में व्यक्त किया गया है। कोई भी संस्था चाहे वह सामाजिक अथवा धार्मिक हो या राजनैतिक अथवा व्यावसायिक हो, को प्रबन्ध के सामान्य सिद्धान्तों का पालन करना पड़ता है। प्रबन्ध के सिद्धान्त यह बताते हैं कि किस प्रकार सामूहिक प्रयत्नों द्वारा लक्ष्यों को प्राप्त किया जाता है। इसीलिए प्रबन्ध को एक सार्वभौमिक प्रक्रिया के रूप में व्यक्त किया गया हैं।

प्रबन्ध की सार्वभौमिकता को मान्यता देने वाले प्रमुख प्रबन्धशास्त्रियों में ऐलन, लारेंस ए. एप्पले थियो हैमन, कूण्ट्ज एवं ओ’ डोनेल प्रमुख हैं। इनका मानना है कि प्रबन्ध सभी जगह व्याप्त है, चाहे व्यवसाय छोटा हो या बड़ा, एकाकी व्यापार हो, साझेदारी या कम्पनी, सभी में प्रबन्ध की अस्तित्व अवश्य मिलेगा। सरकार हो या किसी तहसील की नगरपालिका, स्कूल हो या विश्वविद्यालय सभी जगह प्रबन्ध विराजमान है। प्रबन्ध सर्वव्यापी है, क्योंकि इसका कार्य व क्षेत्र व्यापक है।

टेलर ने प्रबन्ध की सार्वभौमिकता को स्पष्ट करते हुए कहा है-“वैज्ञानिक प्रबन्ध के प्राथमिक सिद्धान्त सभी मानवीय क्रियाओं अर्थात् एक साधारण व्यक्ति की क्रियाओं से लेकर बड़े निगमों की क्रियाओं तक में लागू होते है।”

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