Business Management

नव-चिर प्रतिष्ठित प्रणाली से क्या आशय है ? प्रबन्ध के क्षेत्र में मानवीय सम्बन्ध दृष्टिकोण को समझाइये।

नव-चिर प्रतिष्ठित प्रणाली या विचारधारा (Neo-Classical System or Approach)

नव-चिर प्रतिष्ठित प्रबन्ध विचारधारा ने चित्र प्रतिष्ठित विचारधारा में अनेक संशोधन सुझाए हैं, जिसके कारण इसे नव-चिर प्रतिष्ठित या संस्थापक प्रबन्ध विचारधारा कहा जाता है। इस विचारधारा के समर्थक एल्टन मेयो एवं उसके अनुयायी एम. पी. फोलेट, चेस्टर इविंग बर्नार्ड, डगलस मैक ग्रेगर, आर. लाइकर्ट तथा क्रिस आगिरिस है।

इन विद्वानों ने वैज्ञानिक प्रबन्ध एवं प्रशासनिक प्रबन्ध सिद्धान्तों की जाँच की तथा यह पाया कि चिर प्रतिष्ठित सिद्धान्तकारों के इन सिद्धान्तों के प्रयोग के परिणाम अच्छे नहीं निकले क्योंकि उद्योगों में यन्त्रों, मशीनों, विशिष्टीकरण एवं उत्पादकता पर जोर दिया जा रहा था। अमिक श्रम बाजार की वस्तु एवं मशीनीपूर्जे का रूप धारण कर चुका था नियोक्ता एवं श्रमिकों के सम्बन्धों पर ध्यान न दिया जाकर कार्यक्षमता व उत्पादकता वृद्धि के प्रयास किये जा रहे थे। इस प्रकार चिर प्रतिष्ठित या शास्त्रीय सिद्धान्तकारों ने कार्य की वास्तविक दशाओं की अवहेलना एवं मानवीय घटक के महत्व की उपेक्षा की गई। फलस्वरूप मानवीय सम्बन्धकारों ने चिरप्रतिष्ठित या शास्त्रीय (Classical) सिद्धान्तकारों की इस बात को लेकर चुनौती दी और उसमें निहित कमियों को दूर करने का प्रयास किया। इस विचारधारा को आधुनिक कहने के बजाय नवशास्त्रीय या नव-चिर प्रतिष्ठित विचारधारा कहा गया क्योंकि यह चिर प्रतिष्ठित या शास्त्रीय विचारधारा के सैद्धान्तिक स्वरूप का ही अनुसरण करती है तथा शास्त्रीय विचारधारा के अवैयक्तिकता (impersonality) के विरुद्ध प्रतिपक्ष के रूप में प्रबन्ध के मानवीय आयाम पर जोर देती है।

प्रबन्ध विचारधारा विकास के क्षेत्र में नव-विर-प्रतिष्ठित विचारधारा का अध्ययन निम्न दो शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है-

(I) मानवीय सम्बन्धों का दृष्टिकोण या विचारधारा (II) व्यवहारवादी दृष्टिकोण या विचारधारा (I) मानवीय सम्बन्धों का दृष्टिकोण या विचारधारा

मानवीय सम्बन्ध विचारधारा से आशय संस्था में कार्यरत कर्मचारियों के साथ अच्छे पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित करने एवं उनके हितों को सामान्य हितों के साथ एकीकृत करने से है। यह विचारधारा मानव को एक वस्तु न मानकर उसके साथ मानवीय आधार पर व्यवहार करने पर बल देती है। प्रबन्ध में मानवीय सम्बन्ध का दृष्टिकोण का प्रतिपादन जॉर्ज एल्टन मेयो तथा उनके सहयोगी जॉन डेवरी, कुर्टलेविन आदि ने किया। जॉर्ज एल्टन मेयो के प्रबन्ध विचारधारा सम्बन्धी इस दृष्टिकोण का अध्ययन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है

(1) मानवीय सम्बन्ध दृष्टिकोण का प्रतिपादन- एल्टन मेयो का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान हॉयन तथा अन्य प्रयोगों द्वारा प्रबन्ध के क्षेत्र में मानवीय सम्बन्धों का प्रतिपादन किया जाना है। उनको इस विचारधारा के जनक के रूप में जाना जाता है।

(2) रचनात्मक नेतृत्व का विकास-रचनात्मक नेतृत्व प्रबन्ध विज्ञान का हृदय है। कुशल नेतृत्व के बिना सफलता की कामना नहीं की जा सकती। प्रबन्ध के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने अधीनस्थ कर्मचारियों का उचित ढंग से सही दिशा में नेतृत्व करें।

(3) गैर-मौद्रिक अभिप्रेरण-एल्टन मेयो द्वारा किये गये हॉर्योन प्रयोग इस बात के सूचक थे कि उत्पादकता को बढ़ाने में धन सम्बन्धी तत्त्व या कार्य की दशाएँ; जैसे-शुद्ध पानी, बिजली, वायु, विश्राम आदि सीमित महत्त्व रखते हैं अतः इसके अतिरिक्त उन्हें गैर-मौद्रिक अभिप्रेरणाओं की आवश्यकता होती है, ताकि वे स्वेच्छा से अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित हो सकें।

(4) उचित सन्देशवाहन व्यवस्था-एल्टन मेयो के अनुसार कर्मचारियों तथा प्रबन्धकों के मध्य सहयोगपूर्ण एवं सद्भावनापूर्ण वातावरण बनाने में उनके मध्य विचारों का मुक्त आदान-प्रदान होना नितान्त आवश्यक है। यह केवल प्रभावी आधुनिक सन्देशवाहन के साधनों द्वारा ही सम्भव है।

(5) कर्मचारियों को विकास के अवसर इस विचारधारा के अनुसार प्रबन्ध को अपने कर्मचारियों को उनकी योग्यताओं एवं निपुणताओं के विकास में समुचित सहयोग प्रदान करना चाहिए। ऐसा करने से न केवल कर्मचारी योग्य होंगे, बल्कि प्रबन्ध तन्त्र को उनकी योग्यताओं को पूरा लाभ मिलेगा। (II) व्यवहारवादी दृष्टिकोण प्रबन्ध के क्षेत्र में व्यवहारवादी विचारधारा से आशय मानवीय व्यवहार का सामाजिक एवं व्यवहारवादी विज्ञानों के सन्दर्भ में अध्ययन द्वारा यह ज्ञात करना है कि मानवीय व्यवहार किन-किन घटकों द्वारा प्रभावित होता है। इस विचारधारा में समाजशास्त्र, मानव विज्ञान तथा मनोविज्ञान को शामिल किया जाता है।

इस विचारधारा ने प्रबन्ध को समझने में नई दृष्ठि प्रदान की है, जिसके परिणामस्वरूप मानवीय सम्बन्धों की विचारधारा की एक नई संकल्पना ने जन्म लिया है। इस विचारधारा के महत्त्व को निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत रखा जा सकता है

(1) मानवीय सम्बन्धों की अवधारणा को समझाने में सहायक प्रबन्ध की यह विचारधारा मानवीय सम्बन्धों की अवधारणा को समझने में महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करती है। उपक्रमों के आकार में वृद्धि होने के साथ-साथ संगठनों का आकार भी निरन्तर बढ़ता जा रहा है, परिणामस्वरूप मानवीय सम्बन्धों की समस्या जटिल होती जा रही है। व्यवहारवादी विचारधारा मानवीय सम्बन्धों को समझने, उनमें सुधार लाने एवं उन्हें सुदृढ़ बनाने में बहुत सहायक होती है।

(2) मानवीय व्यवहार को समझने में सहायक-यह विचारधारा मानवीय व्यवहार को समझने में सहायक सिद्ध हो सकती है। कौन- -सा कर्मचारी किस स्थिति में कौन-सा व्यवहार करता है, कर्मचारियों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, एक अधिकारी को अपने अधीनस्थों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए आदि का निर्धारण करने में व्यवहारवादी विचारधारा अत्यन्त उपयोगी है।

(3) कर्मचारियों को अभिप्रेरणा देने में सहायक-वर्तमान समय में कर्मचारियों से कार्य लेते समय उनकी क्षमता का समुचित उपयोग करने के लिए उन्हें अभिप्रेरित करना अति आवश्यक होता है। यह विचारधारा कार्यरत कर्मचारियों की उन असन्तुष्टियों, परिवेदनाओं, शिकायतों एवं भावनाओं में सहायक है जिनका समाधान करके उन्हें अभिप्रेरित किया जा सकता है।

(4) कर्मचारियों की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि-व्यवहारवादी विचारधारा संगठन में कार्य करने वाले कर्मचारियों की मानसिक एवं सामाजिक सन्तुष्टि में सहायक होती है।

(5) समूह गति विज्ञान के अध्ययन में सहायक-व्यवहारवादी विचारधारा प्रत्येक उपक्रम में पाए जाने वाले छोटे-छोटे औपचारिक समूहों की क्रियाओं के अध्ययन में सहायक होती है। समूहों का निर्माण किस प्रकार होता है और व्यक्तियों के मध्य किस प्रकार अन्योन्य क्रिया होती है, इस विचारध रा की सहायता से ज्ञात होती है।

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